Monday, 18 September 2017

​​बच्चे और आप

अगर आप सुबह किसी भी चैनल पर न्यूज़ देखते हैं तो टॉप 50 या टॉप 100 या ख़बरें फटाफट पर कभी गौर किया है? इन टॉप न्यूज़ में 3-4 न्यूज़ बलात्कार की होती है| इसमें 1-2 नाबालिगों के साथ हो रहे बलात्कार की होती है| ये नाबालिग मतलब 15 साल से कम आयु! लगभग सारे बलात्कारी जान पहचान के होते हैं| इनमें स्कूल,पड़ोसी रिश्तेदार और अपने सगे बाप भाई चाचा भी होते हैं|
आइये ज़रा आज के समाचार पर भी नज़र डाल लेते हैं|
एक 8 साल की लड़की के साथ पड़ोसी ने किया और दूसरे शायद 6 साल की बच्ची का स्कूल के दो टीचर्स ने बलात्कार किया|
७० वर्षीया माँ का ४५ वर्षीय बेटा २ साल तक बलात्कार करता रहा|
गरिमा कहां बची है? आँख का पानी कहां है? माफ़ कीजियेगा संस्कृति और सभ्यता की रक्षा वैलेंटाइन डे बंद करवा के होगा क्या?
खैर ये बिलकुल अलग बहस है और इस पर कभी और चर्चा करेंगे| मगर बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? आज भी कहती हूँ अभिवावक के तौर पर आपकी जिम्मेदारी सबसे ज्यादा है| क्या स्कूल में आज क्या पढ़ाई हुआ इसके अलावा भी आप अपने बच्चे से कुछ और बात करते हैं? जितनी शिद्दत से उनकी कॉपियां देखते हैं क्या उतने ही लगन से बच्चे के शरीर और बर्ताव पर ध्यान देते हैं? बच्चों के मार्क्स से ज्यादा क्या किसी और बात की चिंता लगती है? प्रद्युमन जैसे हादसे अचानक होते हैं और शायद ऐसे हादसों पर उतना बस नहीं चलता| फिर भी अगर किसी माँ बाप ने बच्चों से पूछा होता न कि वे टॉयलेट में अकेले जाते हैं या और कौन जाता है तो शायद ये बात पहले पता चल जाता कि बच्चों के टॉयलेट टीचिंग या नॉन टीचिंग स्टाफ भी उपयोग में लाते हैं और शायद ये हादसा नहीं होता| रयान स्कूल हादसे के बाद जो सबसे पहली बात मेरे दिमाग में आई थी कि मेरी माँ ने मुझसे कहा था कि टॉयलेट अकेले कभी मत जाना| किसी को साथ लेकर जाना| मुझे समझ नहीं आता था और बात दिमाग से निकल भी गयी थी| पर उस दिन समझ आया और अपनी माँ पर गर्व हुआ था कि वो वाकई हर संभावनाओं के लिए अपने बच्चों को तैयार कर रही थी|
आपने रेयान स्कूल पर हो रही माता पिता की चर्चा को भी क्या ध्यान से सुन रहे हैं? बात शुरू कैसे हुई थी ? 45 हज़ार 3 महीने का देते हैं तब भी सुरक्षित नहीं है बच्चे! give me a break seriously! तो क्या 500 रूपये महीने देने वाले माता पिता के बच्चों के साथ ऐसा हो तो यह विषय इतने पुरजोर ढंग से नहीं उठना चाहिए?
दिल पर हाथ रख कर सच बताईयेगा अगर वो शहर दिल्ली ना होता,अगर वो स्कूल इतना महंगा न होता अगर बेदर्दी से हत्या की बजाय सिर्फ शारीरिक या कोई यौन दुराचार होता तो भी क्या आज 10 दिनों तक चर्चा हो रही होती ?
स्कूल का फेलियर है और कई स्कूलों में बहुत कुछ नहीं होता है| मगर ये रोज़ हो रहे हादसों के लिए क्या सिर्फ समाज के विभिन्न घटक ही जिम्मेदार हैं?
और ये समाज है क्या? हम और आप ही है न? फिर चूक किससे हो रही और फिर माफ़ कीजिये ये चूक क्या वर्तमान पीढ़ी का खोट है या फिर कई पीढ़ियों से चले आ रहे ''असंवेदनशील मगर तथाकथित संस्कारी'' मानसिकता का फल है?
बच्चों के प्रति,समाज के प्रति और सबसे बड़ी बात अपने आप के प्रति सही मायनों में जिम्मेदार बनिये| गुड टच बैड टच तो सबसे पहले सिखाना है उसके बाद भी आपको बहुत कुछ करना है:
क्या करें-
१. बच्चों से बात करते रहना सबसे जरुरी है| इस बात के दायरे को बढ़ाइए| बच्चा आपका है| उसकी चुप्पी, गुस्से, चिड़चिड़ापन को समझिये| कई मामलों में बस उसे नकचढ़ा या जिद्दी मानकर बात किया ही नहीं जाता| ये गलत है|
२. बच्चों को अगर डॉक्टर के पास ले जा रहे तो चेक अप के दौरान स्वयं साथ रहे|
३. बच्चा पार्क में खेलने जाता है तो आप भी साथ रहे| 7-8 साल तक के बच्चों के साथ रहना तो बहुत जरुरी है| इसके बाद बच्चे थोड़े समझदार हो जाते हैं|
४. प्ले स्कूल में बच्चों को भेजते हुए या घर में कोई केयर टेकर है तो बच्चों को विशेष रूप से तैयार करें| किसी ऐसे प्ले में तो कभी मत भेजें जो महल्ले के ८-१० बच्चों को इकठ्ठा करके अपने घर के ही किसी कमरे में प्ले स्कूल चलाते हो| घर में कोई केयर टेकर है तो cctv इंस्टाल्ड रखें| पुलिस वेरिफिकेशन और साइको एनालिसिस के बाद ही किसी को यह जिम्मेदारी दें|
५. बच्चा कहीं बाहर ट्यूशन पढ़ते जाता है तो ख्याल रखें वो किसी दोस्त के साथ ही रहे तो बेहतर| किसी भी सूरत में ट्यूशन के तय समय से पहले या बाद तक बच्चे को मत रहने दे| कभी एक्स्ट्रा सवाल या क्लास की बात हो तो उस समय स्वयं जाए|
६. घर में ही कोई शिक्षक पढ़ाने आता है तो आप खुद कमरे में चक्कर लगाते रहें|
७. बच्चों का विश्वास जीतिए| उन्हें भरोसा होना चाहिए कि वो कुछ भी बोलेंगे तो आप उन पर विश्वास करेंगे|
८. लड़का और लड़की दोनों के शरीर के अंगों की जानकारी दें| बढ़ते उम्र के साथ हो रहे शरीर में बदलाव की भी जानकारी दे| बेहतर यही है कि लड़का हो या लड़की उसे दोनों के बारे में बताएं|
९. किसी के डराने, धमकाने या पुचकारने के कब और क्या मतलब हो सकते हैं ये आप बेहतर समझते हैं तो आप ही अपने बच्चों को बेहतर बता सकते हैं|
१०.स्कूल या खेल के मैदान के किसी भाग में बच्चे अकेले ना जाए| विषेशकर बाथरूम में|
११. पड़ोसियों और रिश्तेदारों पर भी बराबर नज़र टिकाये रखें| ऐसा करते वक्त ये ना सोचे कि आप उन पर शक कर रहें या आप अपने ही रिश्तेदार या करीबी पर भरोसा नहीं करके आप अपराध कर रहे हैं| आप बस अपने बच्चों के लिए एहतियात बरत रहे हैं|
१२. यौन अपराध के शिकार सिर्फ बच्चियां नहीं होती| बच्चे भी होते हैं| इसलिए उन्हें भी तैयार करें और नज़र रखें|
१३. बच्चों को बताये कि कोई ऐसा सीक्रेट नहीं होता जो माँ बाप को बताया नहीं जाता| कोई ऐसा खेल नहीं होता जिसमें प्राइवेट पार्ट्स के साथ खेला जाए| कई बार खेल और सीक्रेट के नाम पर दोषी के सालों महीनों तक शोषण करता रह जाता है|
रिश्ते शर्मसार हो रहे हैं| इनकी गरिमा तभी बचेगी जब आप स्त्री और बच्चों की गरिमा तथा बातों को महत्व देंगे| जब तक नहीं देंगे तब तक यही होगा और तीबारा माफ़ कीजियेगा - ये तो अभी शुरुआत है| नहीं सुधरे, सोच-विचार नहीं बदले तो मनुष्य बहुत जल्दी सामाजिक प्राणी होगा|
स्वाति

2 comments:

  1. http://bulletinofblog.blogspot.in/2017/09/blog-post_19.html

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  2. आपने बहुत जरूरी और संवेदनशील विषय पर खुलकर बात की है। बच्चों से रोज़ बात करना, उनका भरोसा जीतना और उनके व्यवहार में बदलाव पर ध्यान देना सचमुच सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बन सकता है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.

    अधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
    धन्यवाद!

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