Thursday, 23 July 2015

चाह नहीं अरमान बनो तुम



बदलते वक़्त की पहचान बनो तुम 
पशु नहीं इंसान बनो तुम ,
ज़िंदगी में कठिनाइयां हैं तो क्या 
लक्ष्य पर चमकते  निशान बनो तुम 

चाह नहीं अरमान बनो तुम 
खुशीयों  का प्यारा जहाँ बनो तुम ,
हर शाह को जो मात दे 
वो आगाज़ नहीं अंजाम बनो तुम । 

स्वाति वल्लभा राज 

Saturday, 14 February 2015

पाती

letter के लिए चित्र परिणाम

​​ऐ पाती तू ले जा संदेसा
मेरे पिया आँगन ,
इह लोक पराया देस लागे
उह लो हीं तो आपन ।
मोह -मरन  से बंधन-मुक्त ;
उन्मुक्त, मैं विचरन  करती ,
भू मंडल पर छिन -छिन अकुलित
व्यथित,गुन -दोस आंकलन करती ।
भ्रमर सा भ्रमित उद्विग्न मन;
भटके हर लत-कली -डाल -पुष्प ,
चित पर अँधियारा घन घोर पी
जन्म दत्तक -पालक सब हुए रुष्ट ।
पाती तू ले जा अश्रु ये
रक्त -रंजित कलुषित देह ये ,
दर्पण सा निश्छल प्रेम -पगा
कोरा चित, पी को देय ये।

स्वाति वल्लभा  राज



--

Sunday, 18 January 2015

मन के मोती

मन के मोती 
कभी टूटते 
और चुभते  जाते हैं 
आँखों में, 
कभी पिरोते चले 
चले जाते  हैं ​
खुद-ब -खुद 
और बन  जाती है 
सुन्दर माला । 
पर जीवन 
सुन्दर माला हीं  तो  नहीं,
अपितु टूटे मानकों की चुभन 
पर भी मीठी मुस्कान है 

स्वाति वल्लभा राज  

Wednesday, 6 August 2014

दिवा स्वप्न


सफ़ेद चादर में लपेटे हूँ 
अपनी हसरत,
सबसे खूबसूरत एहसास, 
जिसमें तुम निर्भीक हो 
खेल रही थी मैदान में ,
बिना डर के 
भर रही थी रंग अपने 
हर ख्वाब में, 
कुलाँचे मार रहे थे 
हर उमंग,
तुम खुश थी,
आज़ाद थी ,
बेख़ौफ़ थी ,
हैवानियत के नज़र से दूर थी 
बचपन,यौवन,बुढ़ापा 
सब जीया तुमने भरपूर 
और बेदाग़ रहा तुम्हारा शरीर,
पर जानती हूँ 
यह दिवा स्वप्न है 
माफ़ करना 
मेरी बच्ची इस ख़ौफ़ज़दा
ज़िंदगी के लिए । 

स्वाति वल्लभा राज 


Monday, 4 August 2014

सपनों के दुर्गन्ध




मन के बगीचे में 
ठहर गया है स्वप्न पानी  सा, 
और हर पल घिरी हूँ अब 
अपने हीं सपनों के दुर्गन्ध में । 

खोदना होगा अब एक नाला 
अपने हैं मन में, 
ताकि ये ठहरा पानी निकल जाए 
और महसूस करूँ कुछ ताज़गी 
अपने हैं सपनों का तिरष्कार करके । 
स्मृतियों  के अवशेष में हीं 
ढूँढूँगी उनके निशाँ 
और बढ़ चलूंगी कुछ नयी उड़ान की ओर 
जीवन के कुरुक्षेत्र में । 

स्वाति वल्लभा  राज 

Monday, 7 July 2014

तिरिया चरितर(त्रिया चरित्र)




भूखे बच्चे का पेट भरने को 
और बीमार पति के इलाज़ को 
जब जूठन मलने से काम न चला तो 
आखिर नीलाम कर दिया खुद को उसने । 

औरत के लिए उसके इज्जत के आगे भी 
होती है सिंदूर और कोख की अहमियत,
तभी तो नियति से मजबूर हो,
खुद का अस्तित्व खो 
बन जाती है -
''तिरिया चरितर ''?

स्वाति वल्लभा  राज 

Saturday, 28 June 2014

नीच- जात ​




आज पंचायत जुटी थी 
फुलवा के लिए , 
नीच जात की  होकर
मंदिर में घुसने का दुःसाहस । 
आरोप था सिर्फ ,
प्रत्यारोप का तो सवाल  हीं नहीं, 
मैले कुचले चिथड़ों में 
खुद को ढाकने का विफल प्रयास करती । 
बड़ी बड़ी डबडबायी आँखों से 
आस लगाये,
मुखिया जी की ओर नज़र उठी 
पर तुरंत  नीचे हो लीं । 

कल दोपहर का माज़रा 
आँखों के सामने चल चित्र सा घूम गया
गन्ने  के खेत में जब मुखिया जी ने 
पीछे से दबोचा था उसे, 
मुंह पर हाथ  और गर्दन पर
हसियां रख जब अपने
पजामे का नाड़ा  ढीला किया था, 
और मर्दानगी साबित करने के  बाद 
कहा  था -
''फुलवा ! किसी को बताना नहीं,
मैं जात -पांत नहीं मानता 
जल्द हीं शादी करूंगा ''। 

गिद्ध की आँखों पर भी यकीं कर गयी फुलवा 
और आज मंदिर जा पहुंची 
ऊपर वाले को धन्यवाद कहने । 

तभी मुखिया जी के आवाज़ से 
तन्द्रा टूटी । 
''३ साल के लिए हुक्का -पानी बंद 
और पंचो  द्वारा समूहिक बलात्कार । 
ताकि फिर किसी  
छोटी जात  वालों की जुर्रत ना हो 
मंदिर को अपवित्र करने की ''। 

सन्न और स्तब्ध फुलवा 
तीन शब्दों में घिर गयी 
''छोटी जात , अपवित्र और बलात्कार ''। 


स्वाति वल्लभा राज