अनीह ईषना
Tuesday, 4 August 2015
मनुष्य
बेहयाई में नहायी तुम्हारी निगाहें
बेशर्मी में लिपटी तुम्हारी सोच
''अहम् '' में सिमटा सम्पूर्ण वजूद
निकृष्ट से भी गिरे कर्म
और हसास्यपद विचार ''मनुष्य '' होने का
स्वाति वल्लभा राज
Thursday, 23 July 2015
चाह नहीं अरमान बनो तुम
बदलते वक़्त की पहचान बनो तुम
पशु नहीं इंसान बनो तुम ,
ज़िंदगी में कठिनाइयां हैं तो क्या
लक्ष्य पर चमकते निशान बनो तुम
चाह नहीं अरमान बनो तुम
खुशीयों का प्यारा जहाँ बनो तुम ,
हर शाह को जो मात दे
वो आगाज़ नहीं अंजाम बनो तुम ।
स्वाति वल्लभा राज
Saturday, 14 February 2015
पाती
ऐ पाती तू ले जा संदेसा
मेरे पिया आँगन ,
इह लोक पराया देस लागे
उह लो हीं तो आपन ।
मोह -मरन से बंधन-मुक्त ;
उन्मुक्त, मैं विचरन करती ,
भू मंडल पर छिन -छिन अकुलित
व्यथित,गुन -दोस आंकलन करती ।
भ्रमर सा भ्रमित उद्विग्न मन;
भटके हर लत-कली -डाल -पुष्प ,
चित पर अँधियारा घन घोर पी
जन्म दत्तक -पालक सब हुए रुष्ट ।
पाती तू ले जा अश्रु ये
रक्त -रंजित कलुषित देह ये ,
दर्पण सा निश्छल प्रेम -पगा
कोरा चित, पी को देय ये।
स्वाति वल्लभा राज
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http://swati-vallabha-raj.blogspot.in/
http://swativallabharaj.blogspot.in/
Sunday, 18 January 2015
मन के मोती
मन के मोती
कभी टूटते
और चुभते जाते हैं
आँखों में,
कभी पिरोते चले
चले जाते हैं
खुद-ब -खुद
और बन जाती है
सुन्दर माला ।
पर जीवन
सुन्दर माला हीं तो नहीं,
अपितु टूटे मानकों की चुभन
पर भी मीठी मुस्कान है
स्वाति वल्लभा राज
Wednesday, 6 August 2014
दिवा स्वप्न
सफ़ेद चादर में लपेटे हूँ
अपनी हसरत,
सबसे खूबसूरत एहसास,
जिसमें तुम निर्भीक हो
खेल रही थी मैदान में ,
बिना डर के
भर रही थी रंग अपने
हर ख्वाब में,
कुलाँचे मार रहे थे
हर उमंग,
तुम खुश थी,
आज़ाद थी ,
बेख़ौफ़ थी ,
हैवानियत के नज़र से दूर थी
बचपन,यौवन,बुढ़ापा
सब जीया तुमने भरपूर
और बेदाग़ रहा तुम्हारा शरीर,
पर जानती हूँ
यह दिवा स्वप्न है
माफ़ करना
मेरी बच्ची इस ख़ौफ़ज़दा
ज़िंदगी के लिए ।
स्वाति वल्लभा राज
Monday, 4 August 2014
सपनों के दुर्गन्ध
मन के बगीचे में
ठहर गया है स्वप्न पानी सा,
और हर पल घिरी हूँ अब
अपने हीं सपनों के दुर्गन्ध में ।
खोदना होगा अब एक नाला
अपने हैं मन में,
ताकि ये ठहरा पानी निकल जाए
और महसूस करूँ कुछ ताज़गी
अपने हैं सपनों का तिरष्कार करके ।
स्मृतियों के अवशेष में हीं
ढूँढूँगी उनके निशाँ
और बढ़ चलूंगी कुछ नयी उड़ान की ओर
जीवन के कुरुक्षेत्र में ।
स्वाति वल्लभा राज
Monday, 7 July 2014
तिरिया चरितर(त्रिया चरित्र)
भूखे बच्चे का पेट भरने को
और बीमार पति के इलाज़ को
जब जूठन मलने से काम न चला तो
आखिर नीलाम कर दिया खुद को उसने ।
औरत के लिए उसके इज्जत के आगे भी
होती है सिंदूर और कोख की अहमियत,
तभी तो नियति से मजबूर हो,
खुद का अस्तित्व खो
बन जाती है -
''तिरिया चरितर ''?
स्वाति वल्लभा राज
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