उन्हें शिकायत थी की हमने उन्हें पल्लू से बांध लिया,
बात यूँ उतर गयी दिल में की हमने दामन जला दिया|
वो पूछते रहे क्या पाया पिछले बरस उन्होंने था?
हम सोचते रहे की हमने तो पाया ही उस बरस था|
वो कहने लगे जिंदगी ये नहीं
कि सिमट जाये हम एक रिश्ते में ,
मुस्कुराये हम कि साँसे तो अब
जिंदा हैं उस एक फ़रिश्ते में|
उनकी शिकायत कि हम बदल गए वक़्त के अंदाज़ पर,
हमने पाया हम बदले, या लुट गए इश्क के इल्ज़ाम पर|
वो कहने लगे नामालूम उन्हें अभी कई राज़ हैं,
हम सोचते रहे जिंदगी मेरी तो कब की पर्दाफास है|
स्वाति वल्लभा राज
अच्छी रचना ...
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना , बधाई.
Deleteबहुत ही बढ़िया।
ReplyDeleteसादर
ब्लॉग पर आगमन और समर्थन प्रदान करने के लिए बहुत- बहुत आभार, यह स्नेह सम्बन्ध अनवरत रहेगा,यही अपेक्षा है.
ReplyDeleteवाह ! स्वाति जी,
ReplyDeleteइस कविता का तो जवाब नहीं !
.
ReplyDeleteस्वाति जी ,
सुंदर भावों के साथ अच्छी कविता लिखी आपने …
शुभकामनाओं सहित …
लाजवाब मुक्तक हैं सभी ... भावात्मक ...
ReplyDeleteभावपूर्ण रचना...
ReplyDeleteachchi rachna hai swati ji yese hi aage badhti rahiye.
ReplyDeleteबहूत हि बेहतरीन रचना...
ReplyDeleteकितनी सदगी है आपके ब्लॉग पर..
और सदगी हि सुंदरता है...