खून किया मेरे अरमानो का और यूँ ही सिसकता छोड़ दिया,
कसूर क्या इतना था मेरा कि अंगारों पे दहकता छोड़ दिया|
लाज ली जिस सिंदूर की और हाथों से दामन चीर दिया,
मेरी कहानी के अर्थ को , मंजिल से अचानक मोड़ दिया |
साथ न दिया बाबुल तूने भी,दर-दर भटकी थी तन्हा जब मैं,
क्षुधा की थप्पड़ सहती , सिसकी रात-रात भर थी तब मैं|
भूखे जल्लादों का ये समाज ,था आतुर जब चीरने को,
ना आया तू भी जब तिल-तिल कर, पल-पल मरी थी ऐसे मैं|
फिर आया वसंत तू जीवन में मेरे
कोमल एहसास बन कर एक दिन,
पर घिरा तू भी मजबूरियों और
जिम्मेदारियों के चक्रव्यूह में।
तड़प रही तेरी रूह भी है जब
आज हूँ मृत्यु शय्या पर मैं।
थकी हुई आत्मा को है एक सवाल कचोटती,
वो जिसने मेरी मांग भरी या जिसने मुझको जन्म दिया,
या वो फिर जिसने नयी जिंदगी दी,
कौन करेगा मेरी अंत्येष्टि,कौन देगा मुखाग्नि?
क्या यूँ ही फिर शिकार हो जाउंगी
समाज के कई सोच और दायरों का।
स्वाति वल्लभा राज

