Monday, 13 February 2012

ठगा सा प्यार!




यूँ हीं कल नींद उचट गयी
वक्त देखा तो १२ बज रहे थे|
थोड़ी बेचैनी सी लगी तो
बाहर निकल आई|
                                                       
क्षात्रवास के प्रांगण में 
मंदिर के समीप सुगबुगाहट थी कुछ| 
सहसा आवाज़ आई पुच्च”,
कौतुकता ने घेर लिया|                                                       
                                                                                             
                                              
समीप गई तो देखा
दूरभाष पर ही चुम्बन की झड़ी थी|
मुझे देख थोड़ा घबराई मगर
निर्लाज्त्ता से कहा,
दी! haappy kiss डे! 
मैं निरुत्तर सी वापस मुड गई|

स्वाति वल्लभा राज

Sunday, 12 February 2012

मैं तवायफ़





तुम्हारी निगाहें हमें जीना सीखा गई,
तुम्हारी बंदिशे हमें लिखना सीखा गई|
तारीफ़ और क्या करे गुस्ताख दिल
तुम्हारी उल्फ़त हमें महकना सीखा गई|

                                                                             

                                                                     ज़लालत भरी निगाहें तकदीर थी हमारी
                                                                     बड़ी-बिगड़ी बदसूरत तस्वीर थी हमारी|
                                                                     उन कांपती हथेलियों को थामा  जो तुमने
                                                                     तुम्हारी छुवन हमें दहकना सीखा गई|
     
                                                                       
निगाहों के जाम में मद मस्त थी रातें
सजती मगर रोती बिलखती थी वो रातें|
तेरे क़दमों की आहट इनायत थी हम पर
तुम्हारी धडकनें हमें बहकना सीखा गई|

स्वाति वल्लभा राज 

Friday, 10 February 2012

ऐ प्यार तू अनामिका होता

 
ऐ प्यार तू अनामिका होता तो
ऐसे बदनाम ना होता|
शब्द-सीमा से परे होता
तो अनाहत अनाश्य होता|

अनिंदित,अनादी होता,
अनामय अनवरत होता|
शब्द-जाल में फंसा ना होता
तो अछिन्न,अच्युत, अचल होता|

तू अतर्कित,अतर्क्य होता
तू अतन,अवनी,हवन होता|
मोह-जाल में फंसा ना होता
तो अतुल,अकथ,अत्रस्त होता|
स्वाति वल्लभा राज

Sunday, 5 February 2012

जीवन



अन्तः-मन कानन में विस्तृत रम्य अनेकों वन हैं|
कुछ सतपुड़ा-जंगल से घनेरे,कुछ छिटके से जन हैं|
सपनों को कभी विश्राम देते,कभी उद्विग्न मन हैं|
कभी अस्तित्व आश्वस्त करते,कभी विरक्त तन हैं|

रश्मि-रथी के ओज से वंचित कहीं अंधेर नगरी बसी,
अत्यधिक तेज से झुलसी कहीं कोमलता जली पड़ी|
स्वयं को अभिभूत करते फल हैं कहीं आच्छादित हुए,
बाँझपन का फ़िकरा कसते फिर  निर्मम योजन हैं|

नदियों के तट बांधे हुए अडिग से कुछ यौवन हैं,
झंझावात से थके हुए निराश,पड़े से कुछ जीवन हैं|
अन्तः मन की कौतुकता और आत्म-मंथन की तत्परता
हैं कहीं वन की शाश्वतता,तो कहीं बिखरे,लूटे क्रंदन हैं|

स्वाति वल्लभा राज 

Friday, 3 February 2012

मैं बचपन देख रही थी


खिड़की पर खड़े मैं  नीचे जीवन देख रही थी|
भारी बस्तों के बोझ तले कुचले बचपन देख रही थी|
सूनी आँखों में मरे हुए मैं स्वपन देख रही थी|
माँ-बाप के ख्वाइशों को ढोते मैं रुदन देख रही थी|


रक्त-रंजीत कदम की राह में पड़े नुकीले कुरून देख रही थी|
हाँ मैं जीवन देख रही थी,मैं बचपन देख रही थी|
कल मैं छुटपन पे पड़े कफ़न देख रही थी|
आज मैं जीवन और कल मैं मरण देख रही थी|
मैं बचपन देख रही थी,मैं बचपन देख रही थी|

स्वाति वल्लभा राज 

Wednesday, 1 February 2012

स्वागतम

आप सभी समर्थकों,गुरु-जनों और प्रोत्साहन देने वालो से आग्रह है की मेरे दूसरे ब्लॉग पर भी आ कर मुझे प्रोत्साहित करें करें और मार्ग-दर्शन दें|
http://swati-vallabha-raj.blogspot.in/


साभार,
स्वाति वल्लभा राज

वो परछाई


तम के घोर शिविर में 
सिसकती,रोती कलपती,
बेबसी का लबादा ओढ़े
खड़ी थी वो परछाई|

चिता थी सम्मुख
धधकती,भीषण रूप धरे|
भावनाओं को खुद में समेटे
खड़ी थी वो परछाई|


वो गया जिसको जाना था
मन उसका अब भी जल रहा
अपनों से भरे इस दुनिया में,तन्हा
खड़ी थी वो परछाई|

मानवता के कृत्रिम शिखर पर
अट्टहास करती थी चतुराई|
ह्रदय के मुरझाये पुष्प लिए
खड़ी थी वो परछाई|

स्वाति वल्लभा राज