Monday, 7 July 2014

तिरिया चरितर(त्रिया चरित्र)




भूखे बच्चे का पेट भरने को 
और बीमार पति के इलाज़ को 
जब जूठन मलने से काम न चला तो 
आखिर नीलाम कर दिया खुद को उसने । 

औरत के लिए उसके इज्जत के आगे भी 
होती है सिंदूर और कोख की अहमियत,
तभी तो नियति से मजबूर हो,
खुद का अस्तित्व खो 
बन जाती है -
''तिरिया चरितर ''?

स्वाति वल्लभा  राज 

Saturday, 28 June 2014

नीच- जात ​




आज पंचायत जुटी थी 
फुलवा के लिए , 
नीच जात की  होकर
मंदिर में घुसने का दुःसाहस । 
आरोप था सिर्फ ,
प्रत्यारोप का तो सवाल  हीं नहीं, 
मैले कुचले चिथड़ों में 
खुद को ढाकने का विफल प्रयास करती । 
बड़ी बड़ी डबडबायी आँखों से 
आस लगाये,
मुखिया जी की ओर नज़र उठी 
पर तुरंत  नीचे हो लीं । 

कल दोपहर का माज़रा 
आँखों के सामने चल चित्र सा घूम गया
गन्ने  के खेत में जब मुखिया जी ने 
पीछे से दबोचा था उसे, 
मुंह पर हाथ  और गर्दन पर
हसियां रख जब अपने
पजामे का नाड़ा  ढीला किया था, 
और मर्दानगी साबित करने के  बाद 
कहा  था -
''फुलवा ! किसी को बताना नहीं,
मैं जात -पांत नहीं मानता 
जल्द हीं शादी करूंगा ''। 

गिद्ध की आँखों पर भी यकीं कर गयी फुलवा 
और आज मंदिर जा पहुंची 
ऊपर वाले को धन्यवाद कहने । 

तभी मुखिया जी के आवाज़ से 
तन्द्रा टूटी । 
''३ साल के लिए हुक्का -पानी बंद 
और पंचो  द्वारा समूहिक बलात्कार । 
ताकि फिर किसी  
छोटी जात  वालों की जुर्रत ना हो 
मंदिर को अपवित्र करने की ''। 

सन्न और स्तब्ध फुलवा 
तीन शब्दों में घिर गयी 
''छोटी जात , अपवित्र और बलात्कार ''। 


स्वाति वल्लभा राज 

Saturday, 7 June 2014

छदम लिखती हूँ


छदम लिखती हूँ ,
कभी प्रपंच लिखती हूँ ,
लिखूं ना गर भाव , 
तभी कलंक लिखती हूँ ,

सोना उगल भी दें शब्द तो क्या 
भाव में जो पगे  नहीं ,
वो शब्द बेमोल हीं 
तृप्ति  में जो पके  नहीं ,


लूट लें वाह- वाही हीं पर 
अलंकृत, बेमोल शब्द 
गढ़ नहीं सकते ह्रदय में 
भाव सुन्दर और खरे । 

स्वाति वल्लभा  राज 

Thursday, 29 May 2014

दर्द लिखती हूँ




जज्बों पर पड़े ठन्डे सर्द लिखती हूँ 
दर्द लिखती हूँ,
फलक पर दर्द लिखती हूँ ।

गुम हुए अपने शब्द लिखती  हूँ  
दर्द लिखती हूँ,
फलक पर दर्द लिखती हूँ ।

रूह पर पड़े, फैले गर्द  लिखती हूँ 
दर्द लिखती हूँ,
फलक पर दर्द लिखती हूँ ।

हर ख्वाइशों के रंग ज़र्द लिखती हूँ 
दर्द लिखती हूँ,
फलक पर दर्द लिखती हूँ ।

दूध को बेआबरू करता मर्द लिखती हूँ 
दर्द लिखती हूँ,
फलक पर दर्द लिखती हूँ ।

स्वाति वल्लभा राज 

Sunday, 25 May 2014

काश! मैं ताड़ होती

जब भी होता आंधी  का सामना 
काश ताड़ के पत्तों की तरह 
मैं भी कट  जाती कई भागों में,
फिर जीवन के थपेड़ों के वेग 
मुझे भी नहीं गिरा पाते । 
जरा सा झंझोरकर बस 
निकल जाते मेरे बीच से,
मैं भी निर्भीक हो 
खड़ी  होती अटल,
निर्मूल ना होती 
जड़ी रहती जड़ों से । 

या फिर होती 
बांस के पत्तों सी,
आंधी जिधर मोड़ती 
मुड़  जाती मैं भी ,
थपेड़ों के चंवर में 
डोलती तो जरूर 
पर उखड़ती नहीं 
अपने वजूद से । 

पर मनसा वचसा  
हिना की पत्ती,
पिसती जाती,
अपने खून के रंग में 
रंगती जाती,
खुश्बू में 
डुबोती जाती 
अस्तित्व मगर,
निर्मूल औ अचेत हो । 

स्वाति वल्लभा राज 

Wednesday, 14 May 2014

एहसासों की अस्थियां





अनजाने में हीं शब्द
धराशायी कर देते हैं
मन को,
भावनाएं हो जाती हैं कुंठित
और वेदना से भरा मन
आंसुओं में ढुलकाते
चला जाता है
एहसासों की अस्थियां ।
जरुरी नहीं हर शब्द
सुगढ़ और सुन्दर हों,
जरुरत है सिर्फ़
शब्दों को दूर रखने की
उस धारीपन से जो
भेंदते चले जाते हैं
प्रेम से पगे ह्रदय को
और कर देते हैं संज्ञाशून्य
आपके हर एहसास को ।
स्वाति वल्लभा राज

Wednesday, 7 May 2014

अधूरे-अनाम रिश्ते




समेटे हुये हूँ 
तुम्हारा स्पर्श
अपनी हर साँस में,
मेरे हर ख्वाब
ज़िंदा हैं
तुम्हारे नाम पर,
हर वो लम्हे
जो जिये थे
तुम्हारे आगोश में
आज भी मुझे
ज़िंदा रखे हैं,
प्रेम वो नहीं
जो नाम का मोहताज हो,
सिंदूर की लाली हीं नहीं
गढ़ सकती हमारी कहानी ,
कुछ अधूरे-अनाम रिश्ते भी
सम्पूर्ण और पवित्र होते हैं ।
स्वाति वल्लभा राज