Monday, 18 September 2017

​​बच्चे और आप

अगर आप सुबह किसी भी चैनल पर न्यूज़ देखते हैं तो टॉप 50 या टॉप 100 या ख़बरें फटाफट पर कभी गौर किया है? इन टॉप न्यूज़ में 3-4 न्यूज़ बलात्कार की होती है| इसमें 1-2 नाबालिगों के साथ हो रहे बलात्कार की होती है| ये नाबालिग मतलब 15 साल से कम आयु! लगभग सारे बलात्कारी जान पहचान के होते हैं| इनमें स्कूल,पड़ोसी रिश्तेदार और अपने सगे बाप भाई चाचा भी होते हैं|
आइये ज़रा आज के समाचार पर भी नज़र डाल लेते हैं|
एक 8 साल की लड़की के साथ पड़ोसी ने किया और दूसरे शायद 6 साल की बच्ची का स्कूल के दो टीचर्स ने बलात्कार किया|
७० वर्षीया माँ का ४५ वर्षीय बेटा २ साल तक बलात्कार करता रहा|
गरिमा कहां बची है? आँख का पानी कहां है? माफ़ कीजियेगा संस्कृति और सभ्यता की रक्षा वैलेंटाइन डे बंद करवा के होगा क्या?
खैर ये बिलकुल अलग बहस है और इस पर कभी और चर्चा करेंगे| मगर बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? आज भी कहती हूँ अभिवावक के तौर पर आपकी जिम्मेदारी सबसे ज्यादा है| क्या स्कूल में आज क्या पढ़ाई हुआ इसके अलावा भी आप अपने बच्चे से कुछ और बात करते हैं? जितनी शिद्दत से उनकी कॉपियां देखते हैं क्या उतने ही लगन से बच्चे के शरीर और बर्ताव पर ध्यान देते हैं? बच्चों के मार्क्स से ज्यादा क्या किसी और बात की चिंता लगती है? प्रद्युमन जैसे हादसे अचानक होते हैं और शायद ऐसे हादसों पर उतना बस नहीं चलता| फिर भी अगर किसी माँ बाप ने बच्चों से पूछा होता न कि वे टॉयलेट में अकेले जाते हैं या और कौन जाता है तो शायद ये बात पहले पता चल जाता कि बच्चों के टॉयलेट टीचिंग या नॉन टीचिंग स्टाफ भी उपयोग में लाते हैं और शायद ये हादसा नहीं होता| रयान स्कूल हादसे के बाद जो सबसे पहली बात मेरे दिमाग में आई थी कि मेरी माँ ने मुझसे कहा था कि टॉयलेट अकेले कभी मत जाना| किसी को साथ लेकर जाना| मुझे समझ नहीं आता था और बात दिमाग से निकल भी गयी थी| पर उस दिन समझ आया और अपनी माँ पर गर्व हुआ था कि वो वाकई हर संभावनाओं के लिए अपने बच्चों को तैयार कर रही थी|
आपने रेयान स्कूल पर हो रही माता पिता की चर्चा को भी क्या ध्यान से सुन रहे हैं? बात शुरू कैसे हुई थी ? 45 हज़ार 3 महीने का देते हैं तब भी सुरक्षित नहीं है बच्चे! give me a break seriously! तो क्या 500 रूपये महीने देने वाले माता पिता के बच्चों के साथ ऐसा हो तो यह विषय इतने पुरजोर ढंग से नहीं उठना चाहिए?
दिल पर हाथ रख कर सच बताईयेगा अगर वो शहर दिल्ली ना होता,अगर वो स्कूल इतना महंगा न होता अगर बेदर्दी से हत्या की बजाय सिर्फ शारीरिक या कोई यौन दुराचार होता तो भी क्या आज 10 दिनों तक चर्चा हो रही होती ?
स्कूल का फेलियर है और कई स्कूलों में बहुत कुछ नहीं होता है| मगर ये रोज़ हो रहे हादसों के लिए क्या सिर्फ समाज के विभिन्न घटक ही जिम्मेदार हैं?
और ये समाज है क्या? हम और आप ही है न? फिर चूक किससे हो रही और फिर माफ़ कीजिये ये चूक क्या वर्तमान पीढ़ी का खोट है या फिर कई पीढ़ियों से चले आ रहे ''असंवेदनशील मगर तथाकथित संस्कारी'' मानसिकता का फल है?
बच्चों के प्रति,समाज के प्रति और सबसे बड़ी बात अपने आप के प्रति सही मायनों में जिम्मेदार बनिये| गुड टच बैड टच तो सबसे पहले सिखाना है उसके बाद भी आपको बहुत कुछ करना है:
क्या करें-
१. बच्चों से बात करते रहना सबसे जरुरी है| इस बात के दायरे को बढ़ाइए| बच्चा आपका है| उसकी चुप्पी, गुस्से, चिड़चिड़ापन को समझिये| कई मामलों में बस उसे नकचढ़ा या जिद्दी मानकर बात किया ही नहीं जाता| ये गलत है|
२. बच्चों को अगर डॉक्टर के पास ले जा रहे तो चेक अप के दौरान स्वयं साथ रहे|
३. बच्चा पार्क में खेलने जाता है तो आप भी साथ रहे| 7-8 साल तक के बच्चों के साथ रहना तो बहुत जरुरी है| इसके बाद बच्चे थोड़े समझदार हो जाते हैं|
४. प्ले स्कूल में बच्चों को भेजते हुए या घर में कोई केयर टेकर है तो बच्चों को विशेष रूप से तैयार करें| किसी ऐसे प्ले में तो कभी मत भेजें जो महल्ले के ८-१० बच्चों को इकठ्ठा करके अपने घर के ही किसी कमरे में प्ले स्कूल चलाते हो| घर में कोई केयर टेकर है तो cctv इंस्टाल्ड रखें| पुलिस वेरिफिकेशन और साइको एनालिसिस के बाद ही किसी को यह जिम्मेदारी दें|
५. बच्चा कहीं बाहर ट्यूशन पढ़ते जाता है तो ख्याल रखें वो किसी दोस्त के साथ ही रहे तो बेहतर| किसी भी सूरत में ट्यूशन के तय समय से पहले या बाद तक बच्चे को मत रहने दे| कभी एक्स्ट्रा सवाल या क्लास की बात हो तो उस समय स्वयं जाए|
६. घर में ही कोई शिक्षक पढ़ाने आता है तो आप खुद कमरे में चक्कर लगाते रहें|
७. बच्चों का विश्वास जीतिए| उन्हें भरोसा होना चाहिए कि वो कुछ भी बोलेंगे तो आप उन पर विश्वास करेंगे|
८. लड़का और लड़की दोनों के शरीर के अंगों की जानकारी दें| बढ़ते उम्र के साथ हो रहे शरीर में बदलाव की भी जानकारी दे| बेहतर यही है कि लड़का हो या लड़की उसे दोनों के बारे में बताएं|
९. किसी के डराने, धमकाने या पुचकारने के कब और क्या मतलब हो सकते हैं ये आप बेहतर समझते हैं तो आप ही अपने बच्चों को बेहतर बता सकते हैं|
१०.स्कूल या खेल के मैदान के किसी भाग में बच्चे अकेले ना जाए| विषेशकर बाथरूम में|
११. पड़ोसियों और रिश्तेदारों पर भी बराबर नज़र टिकाये रखें| ऐसा करते वक्त ये ना सोचे कि आप उन पर शक कर रहें या आप अपने ही रिश्तेदार या करीबी पर भरोसा नहीं करके आप अपराध कर रहे हैं| आप बस अपने बच्चों के लिए एहतियात बरत रहे हैं|
१२. यौन अपराध के शिकार सिर्फ बच्चियां नहीं होती| बच्चे भी होते हैं| इसलिए उन्हें भी तैयार करें और नज़र रखें|
१३. बच्चों को बताये कि कोई ऐसा सीक्रेट नहीं होता जो माँ बाप को बताया नहीं जाता| कोई ऐसा खेल नहीं होता जिसमें प्राइवेट पार्ट्स के साथ खेला जाए| कई बार खेल और सीक्रेट के नाम पर दोषी के सालों महीनों तक शोषण करता रह जाता है|
रिश्ते शर्मसार हो रहे हैं| इनकी गरिमा तभी बचेगी जब आप स्त्री और बच्चों की गरिमा तथा बातों को महत्व देंगे| जब तक नहीं देंगे तब तक यही होगा और तीबारा माफ़ कीजियेगा - ये तो अभी शुरुआत है| नहीं सुधरे, सोच-विचार नहीं बदले तो मनुष्य बहुत जल्दी सामाजिक प्राणी होगा|
स्वाति

Monday, 19 June 2017

सोच की नींव

हमारा देश गांवों का देश है | हमें अपने गांव की सादगी वाली संस्कृति पर गर्व भी है | मगर गांव है तो संस्कार पक्के ही बनेंगे इस मिथक से बाहर आइये | शादी- ब्याह के समय जो गांवों में नाच कराया जाता है. वो किसी भी दृष्टिकोण से सांस्कृतिक कार्यक्रम तो नहीं ही होता है |  आप चाहे उसे मनोरंजन का साधन मानें या और कुछ | मगर ये आपकी मानसिकता गढ़ता है और आपके बच्चों का व्यक्तित्व | अश्लील गाने और उनपर अश्लीलता की हदें पार करता नाच | लगभग नंगा नाच ! ये सिर्फ एक तस्वीर नहीं है | आप झांकिए कि इस तस्वीर में आपके बच्चे की मानसिकता की नींव है | गौर से तस्वीर देखिये जो कि एक नाच के वीडियो का हिस्सा है और आस-पास के बच्चों को देखिये|  बच्चों की प्रतिक्रियाएं देखिए और सोचिये  ये क्या परोसा गया है उनके सामने ? तस्वीर के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ | मगर मजबूर हूँ दिखाने को |

 बलात्कार, छेड़-छाड़, यौन हिंसाएं के नये तरीकें समाज का आइना बनती जा रही हैं | हम अक्सर कानून और प्रशासन को दोष देकर बच जाते हैं |  कभी अपने गिरेबान में झाँक कर देखने की कोशिश ही नहीं करते | आँखें मूंद  लेते हैं | क्योंकि हमारे सामाजिक परिभाषा के अनुसार ना तो कभी परवरिश गलत हो सकती है और ना अपने बलात्कार करते हैं! परवरिश गलत होने का बिलकुल ये अर्थ नहीं कि माँ बाप गलत सिखाते हैं|  बल्कि ये अर्थ कि माँ बाप समझ ही नहीं पाते कि कौन सी घटना बच्चों के मन में क्या बसा रही और उन्हें क्या बना रही | १०-११ साल का लड़का क्यों स्कुल में सीढ़ियों के नीचे खड़ा रहता है कि कब लड़की ऊपर से आये और वो देख पाये कि स्कर्ट के नीचे क्या है? चुन्नी के नीचे सूखते बहन के अंतर् वस्त्रों को देख जब खिखियता है और कभी बहन उसे सूखाते समय ढकना भूल जाए तो ढक कर सुखाने की हिदायते देते वक्त भी माँ बाप नज़र अंदाज ही तो करते हैं न | तिस पर माँ- दादी की नसीहतें - ‘’ठीक ही तो कह रहा लल्ला ! तुमसे समझदार है|’

जीवन का हर दिन अखबार जैसा होता है | अच्छी और बुरी ख़बरों से भरा हुआ | अच्छे और सच्चे  पलों को हम कटिंग करके अपने पास सम्हाल कर रख लेते हैं और  गलत और बुरी ख़बरों से नज़रें चुरा लेते हैं | मगर ये गलत घटनाएं कभी-कभी दिमाग के कोने में जड़ जमा छिप कर बैठ जाती हैं और डोरमेंट रूप में रहती हैं | जैसे ही इनके मन मुताबिक अवसर आता है ये गलत विचार फल-फूल कर बड़ी हो जाती हैं और भयावह शक्ल अख्तियार करती हैं|

बच्चे सिर्फ टीवी देखकर नहीं बिगड़ते ना ही सिर्फ  पश्चिमी सभ्यता का कोढ़ लग रहा समाज में | कमियां हममें भी हैं | मानिये और दूर कीजिये | सच और अच्छाई की जीत तभी संभव है जब किसी भी परिस्तिथि में हम गलत के आगे ना झुकने के लिए दृढ संकल्पित हैं |स्वयं की गलतियां समझें, स्वीकारें और दूर करें | खिखिया कर टालना आसान है | बलात्कारियों के बीच रहना असंभव !

नोट - इस पोस्ट का अर्थ माँ बाप पर ऊँगली उठाना नहीं है | जड़ें खोदना है |


स्वाति

Wednesday, 29 March 2017

काश कोई ऐसा साबुन होता !



काश कोई ऐसा साबुन होता
जो धो पाता मेरे रूह पर पड़े धूल को!
रूह, जो गन्दी हुई थी पहली बार
जब तुमने कहा था; लड़की हो, धीरे बोलो
जिस उम्र में रंगने थे सपने
तुमने रंग दी मेरी तकदीर
पढ़ाने के बदले सीखा दिया चुप्पी का पाठ
रूह की मैल जम कर काई हो गई
जब शादी के अगले दिन सास ने तौल दिया
गहनों को, मायके की लाज पर
और रात रौंद दिया पति ने सफ़ेद चादर पर
बेटी कोख़ में जो आई
तो पूरी तरह धूसर हुई रूह
तीन को मारने के बाद।
आज ढूंढ़ रही साबुन
जो चमका दे मेरी रूह को
तुम्हारे हिसाब से
सपनों को रौंद कर!
सौ तौले सोने में मोल दूँ मायके की लाज़!
पहली रात में गिरे दो बूंद खून के जो
उठा दे मेरा मान!
जब भी पेट से होऊं
लड़का ही बोउं, लड़का ही कान्टु!
दे देना साबुन जो मिले तुम्हे तो
इस बदरंग रूह का बोझ
अब मुझ पर भी भारी हो रहा!
स्वाति वल्लभा राज

Saturday, 25 February 2017

यौन शिक्षा :साइट्स से या पाठ्यक्रम से ? प्रकाशित लेख

 भारत में यौन  शिक्षा के बारे में सोचना टेढ़ी खीर ही लगती है ।  भारत जैसे विकास शील देश के अलावा अगर  ब्रिटेन जैसे विकसित  देश की बात  करें तो वहां  भी स्तिथि संतोष प्रद नहीं है । बीबीसी में कुछ दिन पहले छपे लेख में इस चिंता को साफ़ तौर पर देखा जा सकता है । जानकारों के अनुसार ‘’ सेक्स की पढ़ाई ना होने से पैदा हुई स्थिति टाइम बम जैसी है जिसकी टिक टिक सुनाई दे रही है’’। ये स्तिथि ब्रिटेन में तब है जब वहां अधिकांश स्कूलों में यौन शिक्षा अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाती है ।

देश में बढ़ते यौन अपराधों के आंकड़ें साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं । कई संस्थाओं और समाजशास्त्रियों द्वारा यौन और प्रजनन शिक्षा के महत्व पर जोर दिया जा रहा है । स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी इसके जरुरत को समझते हुए सराहनीय कदम उठाया है । यौन और प्रजनन शिक्षा पर एक मैनुअल बनाया है जिसे १ लाख से ज्यादा शिक्षकों में बांटा गया है । ‘’साथिया ‘’ नाम से ये शिक्षक देश के किशोरों में कामुकता के रूपों, यौन व्यवहारों, लिंग आधारित व्यवहार, और प्रजनन स्वास्थ्य के मुद्दों पर शिक्षित  करेंगे । इसमें आपसी  सहमति और यौन संबंधों में सम्मान के महत्व की विवेचना है । साथ ही विपरीत लिंगों के प्रति उचित व्यवहार का उल्लेख भी है ।

स्वास्थ्य सचिव सीके मिश्रा द्वारा संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के सहयोग से तैयार यह  रूढ़िवादी सोच से आगे बढ़कर उठाया गया स्वागत योग्य कदम है ।

उदाहरण के लिए, मैनुअल के अनुसार  "एक लड़का अपनी भावनाओं को बाहर निकालने के लिए रो सकता है । वह मृदुभाषी या शर्मीला भी हो सकता है । अशिष्टता  और असंवेदनशीलता मर्दानगी की निशानी नहीं है। अगर लड़कों को कहना बनाना पसंद है या फैशन करना  तो इसका ये कत्तई अर्थ नहीं कि वह मर्द नहीं है । ठीक वैसे ही जैसे अगर लड़कियों को बाइक चलाना या लड़कों के साथ खेलना पसंद है तो इसका यह अर्थ नहीं कि उसके  चरित्र को कटघरे में रखा जाए ‘’  

एक तरफ यह मैनुअल लिंग व्यवहारों को दुरुस्त और संयमित  करने की बात करता है और दूसरी ओर यह यौन गतिविधि और लिंग संवेदीकरण के प्रति जागरूकता लाता है । प्रदेशों में विद्यालय स्तर पर यौन शिक्षा को लागू करने पर चर्चा ज़ारी है ।
आश्चर्यजनक रूप से यह मैनुअल हस्तमैथुन (जो भारतीय परिवेश में निंदनीय  है)  को वांछनीय सुरक्षित सेक्स का विकल्प मानती है । इतना ही नहीं इसमें  लड़कियों और लड़कों के लिए गर्भनिरोधक के विकल्प के बारे में विस्तृत जानकारी के साथ -साथ यौन संचारित रोगों के कारण और रोकथाम के उपायों की भी चर्चा है ।


सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि यौन शिक्षा का अर्थ क्या है और यह जरुरी क्यों है ? यौन शिक्षा ,मानव यौन 

शरीर संरचना विज्ञान,   यौन गतिविधि, प्रजनन स्वास्थ्य, प्रजनन अधिकार, यौन संयम और गर्भनिरोध सहित अन्य 

यौन व्यवहार सम्बंधित ज्ञान है । भारत  ‘कामसूत्रजैसे अद्वितीय कामशास्त्र की धरती है । मिथकों और झूठे लाज के

 परतों से बाहर निकल कर इसकी महत्ता समझने का समय आ गया है ।  यौन संक्रमण के बढ़ते मामलें वाकई में एक

सोचनीय बिंदु है । बलात्कार , छेड़-छाड़ के अलावा यौन जरूरतों के लिए मानव तस्करी तक के केंद्र में कहीं न कहीं यौन

 शिक्षा का अभाव है । आज के नौजवानों का वेश्यालयों के प्रति झुकता लगाव आपराधिक ही नहीं अपितु विकृत

 भावनात्मक प्रवृत्ति को बढ़ा रहा है ।  बढ़ते उम्र के साथ आए शारीरिक बदलाव को किशोरों को सही ढंग से समझाना

 बहुत जरुरी है । ये बदलाव कौतुहल पैदा करते हैं और विपरीत लिंगों के प्रति कई प्रश्न भी । जननांगों  की सफाई बहुत आम शिक्षा है । किशोर और युवा पीढ़ी को यह एहसास दिलाना बहुत जरुरी है कि यौन  व्यवहार में अगर लड़की असहज है और इनकार करती है तो इसका मतलब ना ही है । जबरदस्ती करना  पौरुषता नहीं है । यौन इच्छाओं में नियंत्रण और संयम की शिक्षा सबसे जरुरी है ।

रितेश देशमुख और उतुंग ठाकुर के संयुक्त निर्माण में बनी  फिल्मबालक पालकयौन शिक्षा पर आधारित है ।

अभिवावकों  को यह  समझना बहुत आवश्यक है कि उनके बच्चे यौन व्यवहार  पोर्न साइट्स, अश्लील किताबों  से सीख

 रहे हैं या उचित पाठ्यपुस्तक से ,शिक्षकों के माध्यम से सीख रहे हैं । निःसंदेह यह पाठ्यक्रम किशोरों में बढ़ते गलत

 यौनाचारों  को काम करने में सहयोगी होगा और लिंग भेद तथा यौन अपराधों से परे एक स्वस्थ समाज की नींव रखेगा ।

स्वाति

Wednesday, 12 October 2016

कोख में देवी की बलि !

      

आधुनिकता और पाश्चात्य सभ्यता के अंधाधुंध आपा -धापी में आज भी कई भारतीय पर्व और रीती-रिवाज़ हैं जो हमें अपने मूल और संस्कृति से  जोड़ें हुए हैं। फ़िलहाल नवरात्रि की पूजा प्रारम्भ है और हर तरफ भक्ति की धूनी रमी है । गरबा , डांडिया , जगराता , भजन -कीर्तन में सब डूबे हैं । देवी के नौवों रूप की पूजा - अर्चना हो रही है । सोशल मिडिया पर भी शक्ति की उपासना में सन्देश , चित्र , मन्त्र खूब आदान - प्रदान हो रहे हैं ।
व्रत - उपासना से सब माता रानी को प्रसन्न करने में लगे हैं ।

व्यस्तता और मानसिक रेस के आज के  इस माहौल में ये व्रत नयी ऊर्जा भी देते हैं और शांति भी । हमें अपनी सभ्यता से जुड़ाव का अनुभव होता है । परंतु क्या हमने  सही मायनों में देवी की पूजा का अर्थ समझ लिया  है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि सभ्यता -संस्कृति को हमने सिर्फ पर्व और प्रतीकों के रूप में अपनाया है और इसके वास्तविक गूढ़ अर्थ और मायनों से अभी भी कोसों दूर हैं हम ।

नवरात्रि में देवी के विभिन्न  सौम्य और रौद्र रूपों की नौ दिन पूजा करते हुए हम नवे दिन कंजक खिलाएंगे । ये बच्चियाँ नव दुर्गा रूप मानी जाती हैं । हर साल की तरह इस साल भी श्रद्धा पूर्वक इनकी पूजा - आराधना की जाएगी , पैर धोये जाएंगे और इनके कृपा और आशीर्वाद की कामना की जाएगी ।

क्या ऐसा करने मात्र से हमने सही अर्थों में साधना कर ली ? बच्चियों के लिए ऐसी श्रद्धा हमें नवरात्रो में ही क्यों सूझती है ? जिस बच्ची को कोख में अजन्मे ही मार डालने में हम थोड़ी भी हिचकिचाहट महसूस नहीं करते हैं क्या वो बच्ची देवी का स्वरुप नहीं होती ?  हम में से ऐसे कई लोग होंगे जो कोख में बच्चियों को मार देते हैं और फिर वही लोग दुर्गा - पूजा में शक्ति की उपासना भी करते हैं । कंजक खिलाकर पूजा का असली फल प्राप्त करने के लिए बच्चियाँ चाहिए तो जरूर बशर्ते वो दूसरे की हों ! देवी का रूप अपने घर में अपने , बहू  या बेटी की कोख से नहीं चाहिए ।

हर साल भ्रूण - हत्या की बढ़ती वारदातें और स्त्री - पुरुष का बिगड़ता लिंगानुपात क्या किसी भयावह स्तिथि की ओर संकेत नहीं कर रहा है ? हम तो कोख में देवी की ही बलि दे देते हैं और हमें डर भी नहीं लगता !
भयावहता एक दूसरा स्वरूप भी है । जब इन छोटी - मासूम बच्चियों का बलात्कार किया जाता है क्या तब वो देवी का स्वरुप नहीं होती हैं ? विकृत मानसिकता के धनी इन बलात्कारियों के लिए ७ दिन की बच्ची के लिए भी वहशीपना भर हुआ है ।  


कृत्य और सोच में यह विरोधाभास सोचनीय है । हमें आत्म - मंथन की जरुरत है । अगर वाकई हमें अपने जीवन में दुर्गा सप्तशती के मन्त्रों की सकारात्मक ऊर्जा भरनी है तो हमें अपने विचारों में बदलाव लाना होगा ।  पूरे ३६५ दिन हमें बच्चियों को आदर और सम्मान देना होगा । उनसे पैदा होने का हक़ हम नहीं छीन सकते ।

जब हम दिल से बच्चियों को अपनाएंगे और जन्म लेने का , खुल कर जीने का सामान अधिकार देंगे , उसी दिन हम वाकई सही मायनों में शक्ति के उपासक होंगे । वरना कितने भी व्रत - उपवास कर लें , हवन कुंड में कितनी भी आहुतियाँ दे दें , भगवती कभी प्रसन्न नहीं होने वाली हैं ।










Thursday, 29 September 2016

फेमिनिस्ट मादा मच्छर

मच्छर भगाने के उपाय के लिए चित्र परिणाम

सदियों से पुरुषों को लगता है कि पत्नियाँ  उनका खून पीती हैं और बेचारा पुरुष समाज लाचार बेबस है!
नारी के लिए इस अशोभनीय और अमर्यादित भाषा पर मैंने अक्सर शर्माजी को यहाँ - वहाँ भिड़ते देखा है । छायावाद में भी इसका अर्थ ,शाब्दिक अर्थ की भयावहता से कम खतरनाक नहीं है ।
जबसे दिल्ली में मलेरिया , डेंगू और चिकन गुनिया का प्रकोप बढ़ा है तब से शर्माजी इस सत्यता के स्थापन में जुड़ गए हैं ।
’’इंसानों में क्या मच्छरों में भी मादाएँ ही खून पीती नज़र  आ रही हैं । बेचारे पुरुष मच्छर पुष्प अर्क  का पान करते हैं और महिला मच्छर स्वभावानुसार रक्त पान करती हैं’’
दांत निपोरते शर्माजी ने तो तुलनात्मक अध्ययन पर नया अध्याय ही लिख दिया ।
‘’चाहे जो जुगत बिठा लो स्त्री -हठ शास्त्र -प्रसिद्ध है  । फिर भला महिला मच्छर क्यों पीछे हो !विज्ञापन में लम्बी जीभ निकाल कर लपक लपक कर मच्छर खाती मशीन भी इनकी ढिठाई के आगे दम तोड़ रही है ‘’

शर्मा -उवाच और मच्छर पुराण यही बंद नहीं हुआ ।  भावावेश में बेचारे पेट की बात भी कह गए ।
‘’आदि काल से स्त्री झगड़े की वजह रही है । अब देख लीजिये ये मादा मच्छर भी दो पूर्ण बहुमत से चुनी हुयी सरकारों के बीच  की खाई को और बढ़ा  रही है । मच्छर ने जो रायता फैलाया उसकी जिम्मेदारी कोई नहीं ले रहा मगर तू -तू ,मैं -मैं  खूब मची है ।

शर्माजी बात बात में पते की बात कह गए । वास्तव में मादा मच्छर ने क्या कोहराम मचा  रखा है । इतना डराया कि साहब लोग तक भाग खड़े हुए । झगड़ा और डर दोनों की वजहें यही तो हैं ।
बेचारे नासमझ और समझदार सब  इन मादाओं के मोहपाश में हैं । क्या द्वापर का हस्तिनापुर और क्या कलियुग की दिल्ली ! रक्त -चूषक मादाएं आदमी तो आदमी प्रशासन तक का खून  चूसती आयी हैं ।

शर्माजी का तो पता नहीं मगर दिल्ली मादा -मच्छर और मत्सर के मृग-मरीचिका में जरूर फंस गयी है । जिन्हें मरना नहीं चाहिए अब तो वो भी श्रीमती मच्छर के दंस से मरणासन्न हो रहे । दिल वालों की दिल्ली आज  मच्छरों की होकर रह गयी है ।

स्वाति 


Sunday, 21 February 2016

ब्राम्हणवाद

जब सब जे.इन.यु और रोहिल विमला काण्ड पर अपने बच्चों का  डर t.v. और F.B पर बता रहे तो मैंने सोचा मैं भी अपनी माँ का डर बता दूँ । कल देर रात मेरी माँ से बात हो रही  थी । बातो बातों में उन्होंने पूछा बेटा  तुम ज्यादा पढ़ती रहती हो तो बताओ क्या सचमुच जो कोहराम मचा रखा है कि ''ब्राम्हणवाद '' ख़त्म करो तो ये लोग इतने हाथ धो के पीछे क्यों पड़ गए हैं ? कितने ब्राम्हण बचे हीं हुए हैं जो खौफ भर रहे सब । और फिर बताया की मेरे परनाना  होम्योपैथ के डॉक्टर थे उन्होंने गाँव में सबके शिक्षा के लिए कितना कष्ट उठाया था । चमार , डोम सब आते थे पढ़ने को । हमने तो क्या दूर दूर तक रिश्तेदारी में भी ये ''ब्राम्हणवाद '' क्या होता है , ये ना दिखाई दिया है न समझ आया है । 
मैं माँ को क्या समझाती । सिर्फ पूछा कौन सा न्यज़ चैनल देखती हो । और कहा  जो भी देखो डीडी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ जरूर देखा करो ।  राजनीति के अलावा बहुत सी पॉजिटिव बातें दिखेंगी और इन सब विषयों पर दूसरा दृष्टिकोण भी दिखेगा । 
बहुत खोजने पर भी accurate डेटा नहीं मिला कि  वाकई में अभी संख्या में ब्राम्हणों की स्थिति क्या है जो '' खौफ '' है ''ब्राम्हणवाद 'को लेकर । मगर जो भी डेटा मिला उससे औसतन ५% जनसँख्या निकल कर आई जो हर सेन्सस में घटती जा रही । 
मैं इंकार नहीं करती कि हरिजनों का पूजा पाठ में रोक , मंदिर में परवेज वर्जित इत्यादि पूरी तरह मनगढंत है । मैं उस परिवार से हूँ जहां लहसुन प्याज आज भी घर में नहीं जाता मगर समय के साथ परिवर्तन को सबने सहर्ष स्वीकारा है । मैंने ये मेरे रिश्तेदार में किसी ने ये जाना है की ''ब्राम्हणवाद '' किस बला का नाम है ? हम मुसलमानों के साथ भी एक थाली में खाने में गुरेज़ नहीं करते । फिर ये कौन से ब्राम्हणो के ''ब्राम्हणवाद '' की बातें करते हैं आप ? और ये खान हैं मुख्य प्रश्न कितने  है ?और क्या मुट्ठी भर ब्राम्हणों के स्वार्थ और पोंगे सोच का लबादा सब पर डाल उन्हें चपटे में तो लेंगे हीं इस शब्द की आड़े में देश बर्बाद करेंगे ?
अरे ये ''ब्राम्हणवाद '' कौन सी परम्परा है जिसे संख्या में इतना कम होते हुए भी आज़ादी के इतने वर्ष बाद भी सब डरे सहमे हैं ? और ये दर की सचाई क्या है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि डर  का पलड़ा दूसरे खेमे में कब का जा चूका है और आप अभी भी वही राग अलाप रहे ? कश्मीरी पंडित सबसे बढ़िया उदाहरण है । वक़्त मिले तो इन सबको पढ़िए और समझिए । शायद एक परम्परा आप हीं ख़त्म कर दें । 
स्वाति वल्लभा राज