Monday, 30 July 2012

बेटियाँ (हाइकु)



बेमौत मरी,
दुल्हन बनी बेटी,
अमीर ना थे|


कोख में हत्या
खामोश डरी बेटी
पंगु समाज|


काहें बढे तू
मुकाबला क्यों करे
विकृत सोच|


रोती बिटिया
चुप चाप सहती
सृष्टि आधार|

 

है क्यों अबला
हवस की शिकार
निकृष्ट कर्म|

स्वाति वल्लभा राज

7 comments:

  1. बहुत सार्थक हायेकु.....अर्थपूर्ण रचना...

    अनु

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  2. wow....great thoughts in less words...amazing.

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार को ३१/७/१२ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी आपका स्वागत है

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  4. छोटी छोटी पन्क्तियों में बहुत कुछ कह दिया आपने
    सार्थक रचना

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  5. सार्थक हाइकू

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