Wednesday, 21 November 2012

स्वाति




चातक की  प्यास बुझाती स्वाति
स्वयं  आज प्यासी भटकती है,
जग को मोती का दान दिये
खुद आभा को तरसती है|

दिन मास ताकता जो चातक,
हर पल बाट जो जोहे है,
एक बूंद कंठ से लगते हीं
उस बूंद को मन से  मोहे है|
दिन मास बरस क्या युग बीते
ये बूंद आप हीं प्यासी है|
प्यासों को शीतल करे, वो
आप दहक की दासी है|

बेमोल पड़े सीप में जो
एक अंश का स्पर्श होए
आभा मंडित  मोती का
सागर में फिर उद्भव होए|
धीरजता का परिचय दिये
जो मोती का निर्माण किये
सौ टुकड़ों में बिखरी हुई
आप पर हर इल्ज़ाम  लिये|

स्वाति वल्लभा राज

8 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर ।

    चातक की प्यास बुझाती स्वाति
    स्वयं आज प्यासी भटकती है,
    जग को मोती का दान दिये
    खुद आभा को तरसती है|

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    1. धन्यवाद इमरान जी

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  2. बहुत खूबसूरती से मन की कसक को कह रही है रचना ।

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  3. कल 23/11/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. धीरजता का परिचय दिये
    जो मोती का निर्माण किये
    सौ टुकड़ों में बिखरी हुई
    आप पर हर इल्ज़ाम लिये|

    सुंदर रचना के लिए बधाई स्वाति जी

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