Tuesday, 24 April 2012

जाऊं कहाँ


रूह जख्मी,जिस्म छीला,
दिल बुझा सा|
कारवाँ में भी वजूद
है तन्हा सा|


मृग-मरीचिका में गुम
खुद की पहचान|
अपने हीं घर में
हम मेहमान|

ये जग अपना या
वो जग है घर|
जीर्ण –शीर्ण ये धाम
सब है जर्जर|

है आत्मा बोझिल
वहाँ जाऊं कैसे?
है दिल कलुषित,
यहाँ निभाऊँ कैसे?

स्वाति वल्लभा राज

12 comments:

  1. vaah ...bahut khoob baut sundar kshanikayen.

    ReplyDelete
  2. है आत्मा बोझिल
    वहाँ जाऊं कैसे?
    है दिल कलुषित,
    यहाँ निभाऊँ कैसे?


    बेहतरीन!


    सादर

    ReplyDelete
  3. व्यथा के भाव ... बहुत खूबसूरती से लिखे हैं

    ReplyDelete
  4. जाके बाबुल से नज़रें मिलाऊं कैसे!
    सटीक, सुन्दर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  5. है आत्मा बोझिल
    वहाँ जाऊं कैसे?
    है दिल कलुषित,
    यहाँ निभाऊँ कैसे?
    ......सुन्दर अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  6. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 19 -04-2012 को यहाँ भी है

    .... आज की नयी पुरानी हलचल में ....आईने से सवाल क्या करना .

    ReplyDelete
  7. रूह जख्मी,जिस्म छीला,
    दिल बुझा सा|
    कारवाँ में भी वजूद
    है तन्हा सा|

    वाह बहुत ही प्रभावपूर्ण क्षणिकाएं !!!

    ReplyDelete
  8. ये जग अपना या
    वो जग है घर|.......बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  9. रूह जख्मी,जिस्म छीला,
    दिल बुझा सा|
    कारवाँ में भी वजूद
    है तन्हा सा|
    वाह ...बहुत खूब।

    ReplyDelete
  10. हाँ ,सुनते तो यही हैं पर पता नहीं उस पार न जाने क्या होगा !

    ReplyDelete
  11. है आत्मा बोझिल
    वहाँ जाऊं कैसे?
    है दिल कलुषित,
    यहाँ निभाऊँ कैसे?.... वाह !! बहुत खूब !!

    ReplyDelete