Monday, 7 April 2014

मेरा गलीचा




मन के सफ़ेद गलीचे  में 
तुम तुरुप गए दो लाइन 
काले रंग से । 
तुरपाई चाहे सिल दे फटे को 
पर 
जोड़ नहीं पायेगा 
अंतर्मन के चीथड़े को,
और बदरंग भी तो कर गया 
मेरे सुन्दर गलीचे को । 
तुम्हे क्या लगा 
सजा दिया तुमने फिर  से 
और सज़ा माफ़,
पर हमारे बीच की खाई को 
पाटना नमुमकिन है । 
खोल दी मैंने आज वो तुरपाई 
और हो गयी मुक्त 
तुम्हारे बंधन से,
वक़्त भर देगा इस जख्म को भी 
और मेरा गलीचा होगा फिर से धवल । 

स्वाति वल्लभा राज 

3 comments:

  1. पूर्णता मोड
    अभिव्यक्ति बेजोड़
    भावना होड

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन उपलब्धि और आलोचना - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. eak nayi shuruaat..........

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