Sunday, 13 April 2014

सहमे मेरे लव्ज़




सिसके,सहमे,घुटे से ​
बेजुबान लव्ज़ 
ठिठके खड़े होंठों के 
दरवाज़े पर 
लाचार, बेबस चाहते तो है 
कहे जाना, सुने जाना,
पर बेहतरी समझते रहे 
यूँ ठिठके रहना, 
चुप्पी की किल्ली चढ़ाये ,
क्या पता बाहर निकले 
और अस्मत लूट ले 
घात लगाये 
लव्ज़ों का कोई सौदागर 

स्वाति  वल्लभा राज

3 comments:

  1. बहुत ही लाजवाब भाव, शुभकामनाएं.

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  2. बहुत गहन और सुन्दर पोस्ट |

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