Saturday, 10 December 2011

मेरी इज्जत

मैं दरियां हूँ  मुझे दायरों  में बहने दो,
ना छेड़ो मुझे किनारों में सिमटने दो|
अस्तित्व में हूँ  मुझे यु ही रहने दो 
बिखर जाउंगी वरना,ऐसे ही चलने दो|




छुआ भी गर मुझे या तो सुख जाउंगी
या फिर उफान में सब कुछ  डुबो जाउंगी|
जलने दो मुझे इस प्यास की आग में
दहक के बुझ कर खाक में मिल जाउंगी|


जलना और बहना   ही मेरी किस्मत है
जल कर भी बहना यही मेरी फितरत है|
क्यों बैठते हो किनारों पर यूँ खामोश
सदियों का इंतज़ार  ही मेरी इज्जत है|



स्वाति वल्लभा राज 

4 comments:

  1. छुआ भी गर मुझे या तो सुख जाउंगी
    या फिर उफान में सब कुछ डुबो जाउंगी|
    जलने दो मुझे इस प्यास की आग में
    दहक के बुझ कर खाक में मिल जाउंगी|

    बहुत ही भावपूर्ण बेहतरीन रचना ...मन को छू गया ...!
    मेरी नई पोस्ट के लिये आपका स्वागत है !

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  2. आपकी प्रस्तुति.बहुत ही खूबसूरत और प्रेरक है।
    समय मिलने पर मेरे पोस्ट "साहिर लुधियानवी" पर आईयेगा । धन्यवाद ।

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  3. बहुत ही सुंदर रचना है ... आपकी भावनाओ का प्रस्तुतिकरण उम्दा होता है !!

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