Wednesday, 28 December 2011

रोटियाँ

जलते हुए ख्वाबों के अध-जले
राख बटोरने हम चलें|
प्यार के इस इल्ज़ाम को भी
खुद को सौपने हम चलें|



तिनका-तिनका हो वजूद मेरा
जो बिखरा था  तेरे आशियाने में,
गैरों की महफ़िल में अब
दामन में समेटने हम चलें|



वो राख जिसमे अब भी मौजूद है
हमारे प्रेम की तपिश,
उस तपिश से ता-उम्र
रोटियां सेंकने हम चलें|

वो रोटी तो अध-पकी ही रहेगी अब
पर साँसों के विराम को
इसी से रोकने हम चलें|


वो रोटी जो कभी सिकीं थी नरम
याद तो बहुत आएगी|
पर तेरे नफरत की आग में जले
रोटियों को भूलने हम चलें|


स्वाति वल्लभा राज




21 comments:

  1. वो रोटी जो कभी सिकीं थी नरम
    याद तो बहुत आएगी|
    पर तेरे नफरत की आग में जले
    रोटियों को भूलने हम चलें|

    ऐसी रोटियां सिकती कम जलती ज्यादा हैं ... मार्मिक प्रस्तुति

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  2. वो रोटी तो अध-पकी ही रहेगी अब
    पर साँसों के विराम को
    इसी से रोकने हम चलें|

    वो रोटी जो कभी सिकीं थी नरम
    याद तो बहुत आएगी|
    पर तेरे नफरत की आग में जले
    रोटियों को भूलने हम चलें|

    क्या बात है शानदार रचना....मन भावुक हो गया....बेहतरीन।

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  3. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना !
    मेरी नई पोस्ट पे आपका हार्दिक स्वागत है !

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  4. बहुत खूब!


    सादर
    ----
    जो मेरा मन कहे पर आपका स्वागत है

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  5. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 29 -12 - 2011 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज... जल कर ढहना कहाँ रुका है ?

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  6. bahut hi sundar abhivyakti .....वो रोटी तो अध-पकी ही रहेगी अब
    पर साँसों के विराम को
    इसी से रोकने हम चलें|

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  7. वो राख जिसमे अब भी मौजूद है
    हमारे प्रेम की तपिश,
    उस तपिश से ता-उम्र
    रोटियां सेंकने हम चलें|... bahut hi badhiyaa

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  8. ब्लॉग पर पधारने और समर्थन प्रदान करने का बहुत- बहुत आभार.
    बहुत सुन्दर रचना,बधाई.

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  9. प्यार के इस इल्ज़ाम को भी
    खुद को सौपने हम चलें|
    बहुत खूब कहा है. आपका ब्लॉग अच्छा लगा. MEGHnet पर पधारने के लिए आभार.

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  10. सुंदर अभिव्यक्ति बेहतरीन भाव पूर्ण रचना,.....
    नया साल सुखद एवं मंगलमय हो,....

    मेरी नई पोस्ट --"नये साल की खुशी मनाएं"--

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  11. भावमय करते शब्‍दों का संयोजन ..बेहतरीन ।

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  12. कल 20/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  13. bhut achhi rachna hae soch gahan hae bhav atirek post .

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  14. बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना !

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  15. अब कैसे बीनूं अधजले टुकड़े!! कैसे सृजन करूँ एक .. ख्वाब .....

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  16. उस तपिश से ता-उम्र
    रोटियां सेंकने हम चलें
    तपिश कायम रहे ....

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  17. This comment has been removed by the author.

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  18. वो रोटी जो कभी सिकीं थी नरम
    याद तो बहुत आएगी|
    पर तेरे नफरत की आग में जले
    रोटियों को भूलने हम चलें|

    ....बहुत सुंदर मर्मस्पर्शी प्रस्तुति...

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