Monday, 4 June 2012

गुस्ताखी माफ (हाइकू)




पस्त  जीवन
फिर भी फील गुड
है प्रजा-तंत्र |


भूख,बेबसी
दमन औ हनन
है लोक-तंत्र |


चिथड़े ढकें
सकुचाई आजादी
क्यों नंगापन |


 
तू है मदारी
हम जमूरे फिर
क्यों प्रलोभन|

स्वाति वल्लभा राज 

6 comments:

  1. तू है मदारी
    हम जमूरे फिर
    क्यों प्रलोभन ...

    सच है सब ही जमूरे हैं उसके सामने पर फिर भी जीने का प्रलोभन ...
    हाइकू बहुत ही लाजवाब हैं सभी ...

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  2. वाह स्वाति जी.. चारों एक से एक बेहतरीन.. मस्त गुस्ताखी :P

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  3. कल 19/06/2012 को आपकी यह पोस्ट (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. बेहतरीन हाइकू..

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