Tuesday, 24 September 2013

उफ़ जिंदगी,हाय जिंदगी

गुमराह, तो कभी राह्परस्त है जिंदगी
गुलाम, तो कभी आजाद है जिंदगी,
चिल्लरों की फुहारों में ही सुकून तो कभी
दौलत की बारिश में,बेकरार जिंदगी ।
दाल-रोटी में खुश तो कभी
छप्पन भोग में तबाह जिंदगी ,
आह कभी तो वाह  जिंदगी
उफ़ जिंदगी,हाय जिंदगी |
स्वाति वल्लभा राज
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

5 comments:

  1. जीवन के विरोधाभास को व्यक्त करती एक सुन्दर रचना |

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  2. नमस्कार!
    आपकी यह रचना कल बुधवार (25-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण : 127 पर लिंक की गई है कृपया पधारें.
    सादर
    सरिता भाटिया
    बस इक नजर चाहिए :
    ''गुज़ारिश''

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  3. सही कहा आपने ।

    सादर

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  4. आह कभी तो वाह जिंदगी....sateek

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  5. सुन्दर अभिव्यक्ति .खुबसूरत रचना
    कभी यहाँ भी पधारें।
    सादर मदन
    http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

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