Sunday, 20 November 2011

ओस है ये जिंदगी

ओस की बूंदों की तरह ये जिंदगी,
रात की कोशिशों में बनती और
सूरज की पहली किरण में बिखर जाती|



अगले पल से फिर वही नाकाम कोशिश,
खुद को बनाने की|
बनने के बाद कुछ वक़्त ठहराने की|
ठहराव के बाद कुछ पल जीने की
पर जीने से पहले ही एक डर गुम जाने का|
फिर डर  के सच्चाई का सामना|

ओस की तरह दूब पे बिखर कर
चमकना चाहे ये ज़िन्दगी|
पल भर को ही निडर हो,
जी जाना चाहे ये जिंदगी|

swati vallabha raj












Friday, 18 November 2011

जी करता है



तुम्हारे कंधे पे सर रख कर सब कुछ भुलाने को जी करता है|
तेरी  अनकही बातों  पे  फिर से  मुस्कुराने को  जी  करता है|

तुम   ढूंढों  मुझे  फिर    बेताबी  से  फिर ,
तो  भीड़   में  गुम जाने  को   जी करता है|
सम्हालो मेरे लड़खड़ाते कदम एक बार फिर,
तो आज होश खो जाने को जी करता है|

तुम पुकारो मेरा नाम दिल से तो
तेरी बाहों में ही छुप जाने को जी चाहता है|
क्या कहूँ अब और ऐ वफ़ा,
आज फिर से जी जाने को जी चाहता है|


 स्वाति वल्लभा राज












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Sunday, 4 September 2011

नमोस्तुभ्यम हे सर्वोपरि गुरु

दर्पण से दर्शन तक 
विस्तार है तेरे प्रेम का |
धरा के आगाज़ से अंजाम तक 

विस्तार है तेरे प्रेम का |
तू छू ले माटी सोना हो जाए,
तेरे तपिश में स्वर्ण कुंदन बन जाये|
तू साथ दे तो अस्तित्व मिले,
तेरे सानिध्य में ही महत्त्व मिले |
तू साथ दे तो जग जीतूँ,
जो छोड़े साथ तो मैं भटकूँ |
तेरे डांट में माँ की चिंता दिखें,
लाड में माँ की ममता मिले |
पथ-भ्रष्ट या दिग्भ्रमित होऊं,
तेरा संबल मुझे पथ ज्ञान दे |
तेरा मार्ग-दर्शन ही मुझे
जग में सम्मान दे |
थकू जो बिच राह में तो
तेरे शब्द पुनः स्फूर्ति दे |
इतराऊं जो मंजिल से पूर्व
वही शब्द पुनः जागृति दे|
नतमस्तक हूँ जो तुने
ढेले को मूर्त रूप दिया,
अस्तित्व-विहीना को नव रंग
और स्वरुप दिया |
स्वाति बूंद बरस कर बह जाती,
खोकर खुद को मैं मर जाती
सीप बनकर बटोर उस बूंद को,
और मोती का मुझको रूप दिया |
अपनी आभा से चमकूँ हर पल
तम में भी ऐसा धुप मिले |
कर्जदार मैं हूँ तेरी, हर साथ का हर मोड़ पर |
जीवन-पर्यंत रहना यूँ ही, प्रार्थना कर जोड़ कर |
सृष्टि के आदि से अंत तक
तेरी कीर्ति यूँ ही अमर रहे |
जग को मार्ग -दर्शित करने वाली,
तेरी कृति यूँ ही प्रखर रहे |
हे गौरवमयी गुरु नमोस्तुभ्यम |
नमोस्तुभ्यम हे सर्वोपरि |

Wednesday, 3 August 2011

भरा है मन मेरा

भरा है मन मेरा अभी खालीपन से|
कभी यादों के लुका-छिपी खेलते बचपन से,
कभी कल को सजाती,आज घिसी उबटन से| 
कभी महक समेटे भी विषधरों के बीच खड़े चन्दन से,
कभी जीवन की नरमी का साथ देती सुखी हुई परथन से,
कभी भीड़ में भी एकांत के सिहरन से|

कभी उम्मीदों के चिथड़े ढकती उतरन से,
कभी किसी का पेट भरती थाली के जूठन से,
कभी भावनाओं को भी जमती हुई जामन से|

कभी सपनों का हकीकत की नदी में विसर्जन से,
कभी समाज के टूटे हुए मतलबी बंधन से,
भरा है मन मेरा अभी खालीपन से|
स्वाति वल्लभा राज

Monday, 20 June 2011

चल-चला-चल



मन बहुत विचलित है आज
कि दर्द भी है हो रहा|
जागे थे जिस  ख्वाब से वो
ख्वाब खुद ही सो रहा|

क्या करूँ,जाऊं कहाँ अब
दिल हर पल सोचता|
हरसूँ तो है बस रुदन ही,
दिशा-ज्ञान भी खो रहा|

उठ तो फिर से हे!पथिक मन
बढ़ते जा फिर चल-चला-चल|
गिला करके क्या मिला 
फिर हश्र चाहे जो रहा|

स्वाति वल्लभा राज 




Tuesday, 14 June 2011

और प्यार हो गया

जमाने की रुसवाइयां भी कर गए अनदेखा 
उनके दर्द को इस कदर लगाया खुद से|

दफन कर गये हर एहसास को अपने       
उनके ख्वाबो को यूं सजाया खुद से|

स्वाति वल्लभा राज 

तकिये गीले है

कुछ सपने टूट कर बह निकले
की आज फिर तकिये गीले हैं|
अभी तक नमी महसूस हो रही,
की हम फिर सोतों से मिले हैं|

न सूखते है ये सोते
ना सपने ही पूरे होते हैं|
अमिट छाप छोड़ते ये
अनवरत यूँ हीं बहते हैं|

अश्रु क्या है,
मन -मंदिर के टूटे हुए
सपनो की छवि,
वास्तविकता के पटल पे
जो बनते और बिगड़ते हैं|
स्वाति वल्लभा राज