Tuesday, 24 January 2012

एक सवाल


खून किया मेरे अरमानो का और यूँ ही सिसकता छोड़ दिया,
कसूर क्या इतना था मेरा कि अंगारों पे दहकता छोड़ दिया|
लाज ली जिस सिंदूर की और हाथों से दामन चीर दिया,
मेरी  कहानी के अर्थ को , मंजिल से अचानक मोड़ दिया |

साथ दिया बाबुल तूने भी,दर-दर भटकी थी तन्हा जब मैं,
क्षुधा की थप्पड़ सहती , सिसकी रात-रात भर थी तब  मैं|
भूखे जल्लादों का ये समाज ,था आतुर  जब चीरने  को,
ना आया तू  भी जब तिल-तिल कर, पल-पल मरी थी ऐसे मैं|

फिर आया वसंत  तू जीवन में मेरे 
कोमल एहसास बन कर एक दिन,
पर  घिरा तू भी मजबूरियों और 
जिम्मेदारियों के चक्रव्यूह में।

तड़प रही  तेरी रूह भी है जब 
आज  हूँ मृत्यु  शय्या पर मैं।

थकी हुई आत्मा को है एक सवाल कचोटती, 
वो  जिसने मेरी मांग भरी या  जिसने मुझको जन्म दिया,
या वो फिर जिसने नयी जिंदगी दी,
कौन करेगा मेरी अंत्येष्टि,कौन देगा मुखाग्नि?
क्या यूँ ही फिर शिकार हो जाउंगी
समाज के कई सोच और दायरों का।

स्वाति वल्लभा राज





Saturday, 14 January 2012

उनकी शिकायत

उन्हें शिकायत थी की हमने उन्हें पल्लू से बांध लिया,
बात यूँ उतर गयी दिल में की हमने दामन जला दिया|
वो पूछते  रहे क्या पाया पिछले बरस उन्होंने था?
हम सोचते रहे की हमने तो पाया ही उस बरस था|

वो कहने लगे जिंदगी ये नहीं
कि सिमट जाये हम एक रिश्ते में ,
मुस्कुराये हम कि साँसे तो अब   
जिंदा हैं उस एक फ़रिश्ते में|

उनकी शिकायत कि हम बदल गए वक़्त के अंदाज़ पर,
हमने पाया हम बदले, या लुट गए इश्क के इल्ज़ाम पर|
वो कहने लगे नामालूम उन्हें  अभी कई राज़ हैं,
हम सोचते रहे जिंदगी मेरी तो कब की पर्दाफास है|

स्वाति वल्लभा राज 


Friday, 6 January 2012

प्रार्थना

भगवान जी ! मेरे पापाजी को जल्दी से ठीक कर दो | वो जल्दी से घर आ जाये | आप सभी प्रार्थना करें की वो जल्दी से ठीक हो कर घर आ जाएँ |




ईक्षा, ईहा, डाह, लिप्सा,
क्या ये नरक के द्वार हैं?
अनुभूतियों अनुभवों के
उठते सैकड़ों ज्वार हैं|


नाच रही है सोच मेरी,
अनगिनत धुरियों के इर्द-गिर्द,
पर क्या करूँ जो समझ है
एक ही पिंड को सुपुर्द|


देखती हूँ जीवन को रोज
दो-दो हाथ करते परम शाश्वत सत्य से,
सच  है तो कटु होगा ही,
निः-शब्द हूँ अपेक्षित, असमय  इस कृत्य से|


हे ईश! अवगत  हूँ मैं
तेरे सृष्टि की नियमावली से,
पर एक विनम्र  विनती है 
दर्द-प्रार्थना मिश्रित अरावली से|

दूर रख इस सत्य से अभी 
कुछ बीस-तीस साल मुझे,
जीना,अधिकार उन आँखों का है
जिसने सींचा हर काल मुझे|


पी ले वह जीवन भी 
वास्तविक जीवन का रस 
सच-झूठ के पेशों-पश से परे,
सपनों के हकीक़त का यश|




ॐ साईं राम 



स्वाति वल्लभा राज 

































Wednesday, 28 December 2011

रोटियाँ

जलते हुए ख्वाबों के अध-जले
राख बटोरने हम चलें|
प्यार के इस इल्ज़ाम को भी
खुद को सौपने हम चलें|



तिनका-तिनका हो वजूद मेरा
जो बिखरा था  तेरे आशियाने में,
गैरों की महफ़िल में अब
दामन में समेटने हम चलें|



वो राख जिसमे अब भी मौजूद है
हमारे प्रेम की तपिश,
उस तपिश से ता-उम्र
रोटियां सेंकने हम चलें|

वो रोटी तो अध-पकी ही रहेगी अब
पर साँसों के विराम को
इसी से रोकने हम चलें|


वो रोटी जो कभी सिकीं थी नरम
याद तो बहुत आएगी|
पर तेरे नफरत की आग में जले
रोटियों को भूलने हम चलें|


स्वाति वल्लभा राज




Friday, 23 December 2011

सब्र का बाँध


टूट गया फिर इक दर्द से ही,
क्या करें सब्र का बाँध ही तो है|
उफन पड़ी फिर अश्रु नदियाँ,
पगली,जिद्दी,नादान हीं तो  है|

प्रहार किये बारम्बार जो
दर्द के कटार ने,
रक्त साखी टपक पड़ा स्वपन
मासूम,कमजोर,अनजान हीं तो है|


रौनक कैसे आएगी मुख पे,
हरियाली कैसे छाएगी?
चहुँ  ओर दर्द का आनन
वो भी बंजर बियाबान हीं  तो है|

जो देखा परिंदों को चुगते.उड़ते हुए,
बेफिक्र हो गगन में विचरते हुए|
और पाँख खोलें स्वयं के तो
पाया वो  मृत.भयावह,श्मशान हीं तो है|


आस लगी दिल में की रोऊँ
पर पीर घनेरी कम लगी|
आज उन्मुक्त बह चले ये
मनः वेग अंधड़ सामान हीं तो है|

दुबोएंगी कितनो को ये
आज इस प्रवाह में
बेपरवाह है तत्काल ये
उलझी,उपेक्षित परेशान हीं तो हैं|

स्वाति वल्लभा राज



Saturday, 10 December 2011

मेरी इज्जत

मैं दरियां हूँ  मुझे दायरों  में बहने दो,
ना छेड़ो मुझे किनारों में सिमटने दो|
अस्तित्व में हूँ  मुझे यु ही रहने दो 
बिखर जाउंगी वरना,ऐसे ही चलने दो|




छुआ भी गर मुझे या तो सुख जाउंगी
या फिर उफान में सब कुछ  डुबो जाउंगी|
जलने दो मुझे इस प्यास की आग में
दहक के बुझ कर खाक में मिल जाउंगी|


जलना और बहना   ही मेरी किस्मत है
जल कर भी बहना यही मेरी फितरत है|
क्यों बैठते हो किनारों पर यूँ खामोश
सदियों का इंतज़ार  ही मेरी इज्जत है|



स्वाति वल्लभा राज 

Thursday, 8 December 2011

वक़्त की रफ़्तार

बेगुनाह भी मैं,गुनाहगार भी मैं|
विध्वंसकारी,रचनाकार भी मैं|
सारी सृष्टि तन्मय मुझमे,
इस सृष्टि से बेज़ार भी मैं|


हर रूप में मैं,सब रूप मेरा|
साकार हूँ तो निराकार भी मैं|
ब्रह्मनाद ओमकार भी मैं,
नास्तिकों का तिरस्कार भी मैं|


रक्त-पिपासु तलवार भी मैं,
प्यास बुझती धार भी मैं|
आती मृत्यु का सत्कार भी मैं,
वैतरणी की पतवार भी मैं|


जान सको तो जान लो,
मान सको तो मान लो|
कुछ और नहीं कुछ और नहीं,
वक़्त की रफ़्तार हूँ मैं|



स्वाति वल्लभा राज