Saturday, 29 December 2012

एक पाती-माँ के नाम



माँ जब तुम्हे पता चले मैं लड़की हूँ तो  मुझे कोख में हीं  मार देना ...मुझे इस समाज की दरिंदगी  से बचा लेना ..क्योंकि मैं पहली मौत तो वहीँ मर चुकी होउंगी जब तुम ये पता करने जाओगी  की मैं लड़का हूँ या लड़की ...माँ, तुम सबसे पहले वहीँ मुझे बता दोगी कि मै अवांछित हूँ ...मैं कैसे भी अगर धरती पर आ भी गयी तो क्या होगा? तुम्हे तो हमेशा लगेगा न की मैं लड़की हूँ ...जब जनम देने वाले हीं जनम देने से पहले मुझे निकृष्ट मान चुके होंगे तो मैं बाद बाकियों से कैसे अपेक्षा रखूं? जैसे जैसे मैं बड़ी होउंगी मुझे संस्कार दिए जायेंगे ..संस्कार मतलब-''देखो लड़की हो,सहना सीखो ..क्या हुआ जो किसी ने कुछ कह दिया ...लड़का नहीं हो जो लड़ोगी ...अरे चाचा ने कुछ बतमीजी की,चुप रहो बेटी परिवार टूट जाएगा ...भाई कुछ कह रहा है तो चुप-चाप सुन लो ...सबकी इज्जत करो '' 

मान इज्जत तो करूँ  पर अपने आत्म-सम्मान और इज्जत की बलि देकर? ....

माँ भाई 9 बजे तक बाहर रह सकता है ..मैं नहीं ..क्या माँ  ऐसा नहीं हो सकता की सबके भाई हीं  घर में रहें और मैं और मेरे जैसी लड़कियां बाहर बेख़ौफ़ घूमें? हर बार,हर बात पर मैं हीं रोकी जाउंगी ...सही रहकर भी दुत्कारी जाउंगी ...जी ना पाऊँगी  और ना मर पाऊँगी ...

हर नज़र से कैसे बचूंगी? हर वक़्त अपना संस्कार कैसे साबित करुँगी ? हर पल डर  के साए में पलने से तो अच्छा है माँ,तुम मुझे कोख में उसी पल मार देना जब तुम ये पता करने जाओ कि मैं लड़का हूँ या लड़की ....

स्वाति वल्लभा राज 

Wednesday, 21 November 2012

स्वाति




चातक की  प्यास बुझाती स्वाति
स्वयं  आज प्यासी भटकती है,
जग को मोती का दान दिये
खुद आभा को तरसती है|

दिन मास ताकता जो चातक,
हर पल बाट जो जोहे है,
एक बूंद कंठ से लगते हीं
उस बूंद को मन से  मोहे है|
दिन मास बरस क्या युग बीते
ये बूंद आप हीं प्यासी है|
प्यासों को शीतल करे, वो
आप दहक की दासी है|

बेमोल पड़े सीप में जो
एक अंश का स्पर्श होए
आभा मंडित  मोती का
सागर में फिर उद्भव होए|
धीरजता का परिचय दिये
जो मोती का निर्माण किये
सौ टुकड़ों में बिखरी हुई
आप पर हर इल्ज़ाम  लिये|

स्वाति वल्लभा राज

Sunday, 18 November 2012

महापर्व




आधुनिकता और पाश्चात्य सभ्यता के अंधाधुंध आपा -धापी में आज भी कई भारतीय पर्व और रीती-रिवाज़ हैं जो हमें अपने मूल और संस्कृति से  जोड़ें हुए हैं|ऐसे हीं पर्वों में महापर्व छठ अग्रणी और शिरोधार्य है|यह पर्व सूर्य देव की उपासना का है और सर्व-मंगल कामना पूर्ति हेतु है|इस पर्व को स्त्री-पुरुष दोनों अपनी श्रद्धानुसार रखते हैं|वैसे तो यह पर्व उत्तर भारतीय हिंदुओं द्वारा हीं विशेष  कर मनाया जाता है मगर दूसरे धर्मों में  भी इसकी गूढ़ आस्था देखी गयी है| आस्था का यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जता है|चैत्र और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के षष्ठी तिथि को इस पर्व को मनाया जाता है||लोक कथा अनुसार छठ मैया और सूर्य देव के बीच  भाई-बहन का सम्बन्ध है और सर्व कामना सिद्धि हेतु माँ सूर्य देव की अराधना करती है|खरना के संध्या में भगवती षष्ठी अपने मायका आती हैं|

इस पर्व का वैज्ञानिक महत्व भी है|इस दिन विचित्र खगौलीय स्थिति (चंद्रमा और पृथ्वीके भ्रमण तलोंकी सम रेखाके दोनों छोरोंपर)होती है|जिसके प्रभाव से  सूर्यकी पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतहसे परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, पृथ्वीपर पुन: सामान्यसे अधिक मात्रामें पहुंच जाती हैं । वायुमंडलके स्तरोंसे आवर्तित होती हुई, सूर्यास्त तथा सूर्योदयको यह और भी सघन हो जाती है । वायु मंडल के शुद्धता हेतु इस पर्व के धुप-बत्ती का बहुत योगदान होता है|सूर्य देव की उपासना से उनकी हानि कारक किरणों के प्रभाव से मुक्ति की कामना की जाती  है|

पौराणिक और लोक कथाएँ

छठ पूजा की परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएँ प्रचलित हैं।अथर्ववेद में भी इसके महात्म्य का वर्णन  है|
रामायण से
एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशिर्वाद प्राप्त कियाथा।
महाभारत से
एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है।
कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं।
पुराणों से
एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी|

विधि

यह पर्व चार दिवसीय है|पहले दिन नहाय-खाय से व्रत का प्रारंभ होता है|इस दिन व्रती सेंधा नमक में कद्दू और अरवा चावल का सेवन  करते हैं|दूसरे दिन,दिन भर का उपवास रख कर रात में खरना का प्रावधान है|साठी के चावल को गन्ने के रस में गुड़ डालकर पकाते है|फिर दूध अदरक डाल कर इसे महाप्रसाद बनाते है|व्रती इस रसियाव के साथ घी में चिपुडी रोटी का सेवन करते है|तीसरे दिन दिन भर उपवास रख कर अस्ताचल गामी सूर्य को दूध और मौसमी फलों से अर्घ्य देते है|घाट पर नदी या पोखरे में कमर तक पानी में डूबकर अर्घ्य देते हैं|रात्री में मन्नत अनुसार कोसी भरते है|५ या ७ गन्ने को लाल कपडे से लपेट कर खड़ा करते हैं|इसके अंदर अल्पना बनाते है है और उसके ऊपर फल,पूरी खजूर अत्यादी के टोकरे पर दिये रख कर पूजन करते हैं|चौथे दिन उदय होते सूर्य को अर्घ्य देकर पूजन की समाप्ति होती है|

स्वाति वल्लभा राज

Saturday, 17 November 2012

निराश्रिता (छणिका )





भूत की परछाई ने
तम में 
ऐसा लपेटा,
उजियारे की चाह  में
मौत ढूंढू 
मैं निराश्रिता |

स्वाति वल्लभा राज

Friday, 9 November 2012

अगले जनम मोहे बिटिया हीं कीजौ




न तपन वो ठंडी पड़ी अरमानों के लाश पर भी,
न लगन वो हर हार के मुलाकात पर भी|

बेटों  की क्षमता नहीं हर दर्द पर मुस्कान की,
संसार की गतिमयता में कृति के योगदान की |

सहनशीलता के कंटील चरम पायदान पर,
सुता हीं हरसू विराजित,त्याग के स्थान पर|

हे सृजक! प्रबुद्ध सृजन के नींव हेतु,
अगले जनम मोहे बिटिया हीं कीजौ |

स्वाति वल्लभा राज

Tuesday, 6 November 2012

मैडम बना दिया


जालिम तेरे प्यार ने  मैडम बना दिया
न घर की रही न घाट की 
दर बदर फिरता,कुत्ता बना दिया ,

जो भौंकने लगी,बात बे बात हीं 
औ धौंसियाने लगी मैडम गिरी,
नभ से हल्के सरका,खजूर पर टिका दिया|

हाय ये छलते -घोलते इश्क
और इशिकियाने के निराले  ढंग,
मन में काला रंग घोल, मैला बना दिया|

स्वाति वल्लभा राज

Saturday, 27 October 2012

पक्का घड़ा




सांस तो है चल रही,
पर महसूस कुछ ना हो रहा,
जिंदा हूँ या मृत हुई
एहसास ना कुछ हो रहा|

शब्द औ भावनाएं गुम सी
जड़,निर्मूल खुद को पा रही,
अस्तित्व तो स्थावर हुई,
पर स्वयं जंगम हुई जा  रही|

सोचा खुद को मिट्टी का लोंदा
पर निकली मैं  पक्का घड़ा,
कैसे बदलूं परिपक्वता ये
पाऊं कैसे स्वीकृत रूप बड़ा|

बिखरे,लूटे सम्मान की
समाधी एक   बना डालूँ,
या चंद  कतरों  के वास्ते
नीलामी उनकी कर डालूँ |


कालजयी,इस काल को तुम
मौन सहमति दे रहे,
क्या करूँ,हे ईश!अब मैं
जो तुम भी निष्ठुर हो रहे|

स्वाति वल्लभा राज

Wednesday, 24 October 2012

तांका(जय माँ अम्बे)





अम्बे भवानी
कलुष निवारणी
भय हारणी
मोह-माया तारणी
मुंड-माला धारणी|


शताक्षी,आर्या
शाम्भवी, भव्या,क्रूरा
साधवी,माया 
आद्या, शक्ति स्वरूपा 
नमो नमः हे दुर्गा|

स्वाति वल्लभा राज

Tuesday, 16 October 2012

जय माता दी (हाइकु )



पावनी माता 
आशीष बरसाए 
 उल्लास लाये।

शक्ति की  स्रोत 
रख दो हम पर 
वरद हस्त ।

अष्ट भुजी माँ 
असुर मर्दिनी माँ 
 कृपा बनाओ ।

अटल आस 
विश्वास रहे सदा 
ऐसा  भाग्य दो।


 स्वाति वल्लभा राज 
 
 

Sunday, 16 September 2012

हो जाऊं बदरंग



हो जाऊं बदरंग,
ऐसा रंग भर दो मुझमें 
खामोश हो जाये ये जुबाँ,
ऐसी कहानी गढ़ दो मुझमें|

हौसलों के हौसले भी टूट कर 
बिखर गए हैं अब तो,
इनके पर क़तर दो
अपर हीं रहे ये मुझमें|

ना कल.ना आज,ना कल फिर,
बाकी रहे कोई,
ऐसी स्याही से लिखे पन्ने
जड़ दो मुझमें|

मरने की ख्वाइश भी 
ना जिए कभी अब,
ऐसी हसरत  भारी,
अभी भर दो मुझमें|

स्वाति वल्लभा राज








Monday, 10 September 2012

डर लगता है



शाम के अंधेरों से डर लगता है,
दिन के उजालों में डर  लगता है
ऐ ज़िन्दगी! क्या तू हीं है ये,
तेरे हर इशारों से डर लगता है|

रात की स्याह को  
अजीब  तिश्नगी की प्यास है,
दिन के उजियारे,
आजिज़ आरजुओं की लाश है,

सुलगते  अरमान भी है काफ़िर हुए
ऐ कुदरत! तेरे  काबू की दरकरार है|

दिल की लगी क्या कहें,अब 
दिल्लगी से भी  डर लगता है|
ऐ इश्क!हजारों रंग हों मुबारक चाहे,
खूनी लाल ख्वाइशों  से डर लगता है|

स्वाति वल्लभा राज



Thursday, 6 September 2012

नारी



तू कृष्ण की प्रेयषी,
प्रेम और त्याग की अतुलनीय प्रतिमा,
तू राम की अर्धांगिनी,
साथ और पतिव्रतता की आगाध गाथा|

तू वंदनीय,तू अतुलनीय,
ममता,दया,करुना,वात्सल्य,की एकमेव प्रतिमा
तू अकथ,अथक सृष्टि है
जन्म ,पालन-पोषण की अविस्मरनीय गाथा|

जगत के आदि से अंत तक,
तेरी कीर्ति अनवरत चलती रहेगी,
ब्रम्हाण के हर काल में,
तेरी कृति हरसूं पलती रहेगी|

तू कोमलांगी पर सशक्त है
तू परदे में पर मुक्त है
हर श्वांस में तू लीन है
परमात्मा में विलीन है|

मीरा की प्रेम सी बावली,
दुर्गा रूप में तू तारिणी,
यशोदा  माँ सी निर्झरणी
काली रूप में मुंड धारणी|

चंचला-चपला तेरा स्वरुप है,
जाड़े की सर्द की तू धूप है,
तू अटल,अडिग,आरोह रूप,
नदी सी विस्तृत,नहीं है कूप|

नव युग की पहचान तू,
चहुँ और विख्यात ज्ञान तू,
नयी सोच,खोज का सम्मान तू
कला,संस्कृति और विज्ञान तू...

स्वाति वल्लभा राज

Tuesday, 4 September 2012

हाइकु



हर  तरफ
मद की आगजनी
भय लगाए|


हर जगह
लोभ की अठखेली
है भरमाए|


तिरष्कृत है
ईमान की लड़ाई
कौन,क्यों आए?
 
सफाई हेतु
राजनीती में आए
ना घबराएं|

स्वाति वल्लभा राज

Sunday, 12 August 2012

क्या खूब कही




क्या खूब  अडिग,उन्नति मार्ग पर हम
पर डोलती हमारी संस्कृति  है|
पत्थरों  को भी पूजता  जो देश,
लाशों की हो रही यहाँ राजनीती है|

हरिश्चंद्र  आदर्श जहाँ पर;
सत्य,वचन के रखवाले,
वहीँ खड़े काल्माड़ी,लालू;
घोटालों को खूब पचाते|

राम-राज, स्वपन बापू का
स्वाधीन देश में आएगा,
पर कांग्रेस के रहते क्या ये,
उम्मीद सफल हो पाएगा?

भूखे,नंगों की राजनीती औ,
अपने हित जो साध रहे,
आतितायियों को कबाब देते,
क्या छाप दिलों पर डाल रहे?

जनता भी सोकर जगती और
जगकर फिर सो जाती है,
सौ अन्ना भी हैं कम यहाँ
सौ "आज़ादों" की ये पाती है|

बढ़ें हो चाहें जी.डी.पी.
पर रेट में कछुएं  प्यारे हैं,
और भ्रष्ट तो अम्बानी भी पर 
ग्रोथ रेट तो न्यारे हैं|

मैंने भी क्या है खूब कही,
कहकर है पल्ला झाड लिया.
इस तंत्र से अलग हूँ,थोड़े हीं,
खुद हीं क्या है उखाड़ लिया?

इससे पहले ये नरक हो जाये,
खुद पर हीं एक एहसान करूँ,
भ्रष्ट रहित  पात्र बनकर 
भारत माँ का उद्धहार करूँ|

स्वाति वल्लभा राज

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Friday, 3 August 2012

तुम हम हो;मैं,मैं हीं हूँ



रिश्तों में जितने गहरे गोते तुम लगाओ,
जरुरी नहीं हम भी डूबे उस तलक|
खुद को भूल,संग ले  तुम बढे जहाँ,
जरुरी नहीं छू लें हम भी वो फलक|


            पाते हो आज जो अपने हर हिस्से में 
                                                                             मुझे हीं हरसूं,
                                                                             जरुरी क्या,पाऊं मैं  भी हर  जज्ब में 
                                                                             तुम्हे हरसूं|

ये तुम हो जो हो अधूरे,
मुझ बिन हर  एहसास में |  
  

ये मैं नहीं जो जुड़ जाऊं 
हर बूंद क़ी प्यास में|

क्या मैं बुरा जो 
जोड़ लिया है तुमने खुद को
मेरे हीं अस्तित्व से,
मेरा वजूद तुमसे है जुदा
क्या हो जो हम में प्यार हो.....

स्वाति वल्लभा राज







Monday, 30 July 2012

बेटियाँ (हाइकु)



बेमौत मरी,
दुल्हन बनी बेटी,
अमीर ना थे|


कोख में हत्या
खामोश डरी बेटी
पंगु समाज|


काहें बढे तू
मुकाबला क्यों करे
विकृत सोच|


रोती बिटिया
चुप चाप सहती
सृष्टि आधार|

 

है क्यों अबला
हवस की शिकार
निकृष्ट कर्म|

स्वाति वल्लभा राज

Wednesday, 25 July 2012

जज्बों कि चौपड़



भावनाएं नंगी खड़ी दुनियादारी के बाज़ार में,
कभी तो है बोली लगी,कभी नुमाइश इश्तहार में|
नीलामी हुई कहीं समझदारी के नाम पर
कहीं बेचारी लुटी पड़ी बेवफाई के दाम पर|

 

कभी चाँद छूने की होड में खूब नोच-खसोट हुई
कभी जज्ब को चाँद कह,शीतल अर्क की छिनौट हुई|
भाव जो तेरे खरे-खरे तो हर कदम पे इनको वार दो
इसके साथ में तो सब मिले,फिर चाहे इसको हार दो|

 

जिंदगी की चौपड़ में,हर शख्स आज धर्मराज है,
जज्बों की द्रौपदी की बिकती अब भी लाज है|
फिर चाहे इसको छल कहो या मज़बूरी का जामा दो,
महाभारत तो अटल हीं है,चाहे जो हंगामा हो|

स्वाति वल्लभा राज

Tuesday, 24 July 2012

क्षमा दान






दुःख मिश्रित विस्मित नयन तेरे,
मुझको क्यों हरसूं रुलाती हैं?
तन्हा पाकर आ जाती क्यों
मुझसे फिर क्यों बतियाती हैं?

मैं भुला तो दूँ अस्तित्व तेरा
उन आँखों को क्यों न भुला पाऊं?
नन्हें पादप से ठूंठ हुई
वो आँखें क्यों अकुलाती हैं?

तू आत्मसात मुझमे नहीं पर
दृष्टि तेरी कहीं जागृत है
सोती रातों में जाग उठूँ
वो ऑंखें क्यों चिल्लाती हैं?

कर जोड़ करूँ यह प्रार्थना
मुझको अब क्षमा दान दे तू
मेरे वजूद पर नयन तेरे 
क्यों प्रश्न चिन्ह उठती है?

स्वाति वल्लभा राज...

--
http://swati-vallabha-raj.blogspot.in/

Tuesday, 17 July 2012

तो क्या होगा




तुम भी न समझे तो क्या होगा
तुम फिर न समझे तो क्या होगा?
सिसकती हुई तो बीती थी हीं जिंदगी
इस बात पर कलपे तो क्या होगा?

दर्द आज भी हर हद से पार है
फिर भी जिंदगी का एहसास है|
ये दर्द तुमको पाकर भी जुदाई का,
इस बात से रूठे तो क्या होगा ?
 
मेरे हमदम तुम हीं  तो हो
हर शब हर शाम में लिपटे|
तन्हाइयों की मेरी इस साथिन
आगोश से छूटे तो क्या होगा?

कम कर होती आब-ए-तल्ख़ है
इसके पीछे तू, हमदर्द है|
ये ढका जो तेरे दर्द से तो
पीड़ा ढक कर हीं क्या होगा?

आब-ए-तल्ख़-आँसू

स्वाति वल्लभा राज

जख्म


ख्वाब सजते थे,स्वत्व का एहसास लिए
ज़िन्दगी  का एहसास था मीठे पलों में|
प्रेम की तितली जाने कहाँ गयी
मुझसे हर जज्ब औ हर आस लिए|

आगोश तेरी,मेरा मक्का मदीना
तेरे क़दमों में ही जन्नत थी बसी
चीखते हर अश्क,बेआवाज़ से,
बहार भी लाए पतझड़ महीना|

जम  गए हर लव्ज़ दिल में,
प्यार की  तपिश से जो दूर हुए,
जाऊं कहाँ खुद की लाश लिये
बेमोल ये अनमोल जख्म,बेज़ार तेरी महफ़िल में|

स्वाति वल्लभा राज....

Friday, 13 July 2012

हाइकु


 

कज्जल ऑंखें
अलासायें सपनें
उन्मुक्त मन|


सजल आँखे
मुरझायें सपनें
बेबस मन|


हरी चूडियाँ
औ कागज़ के नाव
संतुष्ट मन|


सूखा सावन
नीरस है जीवन
ठूँठ सा मन|

स्वाति वल्लभा राज

Thursday, 12 July 2012

पराजिता


भींगी पलकें,
सूखते लब,
गुम हुए शब्द,
धराशायी स्वप्न,
स्तब्ध सोच,
किंकर्तव्य विमूढ़ एहसास;
आज बिल्कुल
मृत हैं|
क्या अब भी कहोगे
तुम कर सकती हो?

स्वाति वल्लभा राज

Thursday, 28 June 2012

यशोधरा(चोका)


ये पंक्तियाँ मैथली शरण गुप्त जी कि “यशोधरा” से प्रेरित हैं|


    

जग कल्याण
हित लिये वो गए
आत्म-गौरव
औ मान की ये बात
कैसे बनी मैं
महालक्ष्य-बाधक
मुझ पर ये
असहय आघात
चोरी औ छिपे
गए अँधेरी रात,
नारी बाधक
मुक्ति मार्ग की कैसे
घोर व्याघात,
महा भिनिष्क्रमण
आभाषित था
स्वाभाविक विचार,
लुक छिप के
गृह त्याग निर्णय
शोभित क्या सिद्धार्थ?


स्वाति वल्लभा राज







Wednesday, 27 June 2012

रूप घनाक्षरी


रूप घनाक्षरी,वार्णिक छंद के भेद हैं|इसकी रचना सिर्फ वर्ण गड़ना के आधार पर होती है| २६ से ज्यादा वर्णों कि संख्या वाले वार्णिक छंद, “दंडक” की  श्रेणी में आते हैं और २६ से कम वर्णों की  संख्या वाले “साधारण” की श्रेणी में| रूप घनाक्षरी में ३२ वर्ण होते हैं| १६-१६ वें वर्ण पर या प्रत्येक ८ वें वर्ण पर यति होते हैं|

स्वाति बिन मोती नहीं,
नाहिं हरि बिन कूक|
प्रीति बिन गति नहीं,
काहें  होवे फिर चूक?

हरि-कोयल
गति-मोक्ष
स्वाति वल्लभा राज

दोहा

दोहा, मात्रिक अर्द्धसम छंद है। दोहे के चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) में १३-१३ मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) में ११-११ मात्राएँ होती हैं। विषम चरणों के आदि में जगण ( । ऽ । ) नहीं होना चाहिए। सम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है अर्थात अन्त में लघु होता है।



मन की ठास कसके नित,न कुछ मोहे सुझाय|
सावन की आस बीती,बारिश है भरमाय||

स्वाति वल्लभा राज