Sunday, 5 February 2012

जीवन



अन्तः-मन कानन में विस्तृत रम्य अनेकों वन हैं|
कुछ सतपुड़ा-जंगल से घनेरे,कुछ छिटके से जन हैं|
सपनों को कभी विश्राम देते,कभी उद्विग्न मन हैं|
कभी अस्तित्व आश्वस्त करते,कभी विरक्त तन हैं|

रश्मि-रथी के ओज से वंचित कहीं अंधेर नगरी बसी,
अत्यधिक तेज से झुलसी कहीं कोमलता जली पड़ी|
स्वयं को अभिभूत करते फल हैं कहीं आच्छादित हुए,
बाँझपन का फ़िकरा कसते फिर  निर्मम योजन हैं|

नदियों के तट बांधे हुए अडिग से कुछ यौवन हैं,
झंझावात से थके हुए निराश,पड़े से कुछ जीवन हैं|
अन्तः मन की कौतुकता और आत्म-मंथन की तत्परता
हैं कहीं वन की शाश्वतता,तो कहीं बिखरे,लूटे क्रंदन हैं|

स्वाति वल्लभा राज 

11 comments:

  1. नदियों के तट बांधे हुए अडिग से कुछ यौवन हैं,
    झंझावात से थके हुए निराश,पड़े से कुछ जीवन हैं|

    बेहद अच्छी पंक्तियाँ।

    सादर

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  2. नदियों के तट बांधे हुए अडिग से कुछ यौवन हैं,
    झंझावात से थके हुए निराश,पड़े से कुछ जीवन हैं|... गहन अभिव्यक्ति

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  3. कल 07/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. नदियों के तट बांधे हुए अडिग से कुछ यौवन हैं,
    झंझावात से थके हुए निराश,पड़े से कुछ जीवन हैं|

    बहुत गहरी अभिव्यक्ति और उतनी ही सुन्दर भाषा

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  5. अन्तः मन की कौतुकता और आत्म-मंथन की तत्परता
    हैं कहीं वन की शाश्वतता,तो कहीं बिखरे,लूटे क्रंदन हैं|

    सच, जो कुछ भी है देखा-जाना, ऐसा ही तो जीवन है!

    इस सुन्दर रचना के लिए बधाई!

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  6. कविता गहरे अर्थ समेटे है । सुन्दर प्रतीक हैं । एक निवेदन है कि आप तुकान्त छन्द लिखतीं है तो लय व मात्रा का भी ध्यान रखें । फिर देखें कि आपकी सुन्दर कविता और भी सुन्दर बन जाएगी ।

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  7. स्वयं को अभिभूत करते फल हैं कहीं आच्छादित हुए,
    बाँझपन का फ़िकरा कसते फिर निर्मम योजन हैं|

    वाह !!!!!!!!!!!!!! बहुत ही सुंदर और कोमल भावों की तरंगिणी.......

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  8. अन्तः मन की कौतुकता और आत्म-मंथन की तत्परता
    हैं कहीं वन की शाश्वतता,तो कहीं बिखरे,लूटे क्रंदन हैं|

    जीवन को परिभाषित और विभिन्न पहलुओं को उजागर करती, गंभीर भाव समेटे सुंदर कविता.

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  9. बहुत खूबसूरत रचना...
    गठी हुई अभिव्यक्ति..

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