
मन बहुत विचलित है आज
कि दर्द भी है हो रहा|
जागे थे जिस ख्वाब से वो
ख्वाब खुद ही सो रहा|
क्या करूँ,जाऊं कहाँ अब
दिल हर पल सोचता|
हरसूँ तो है बस रुदन ही,
दिशा-ज्ञान भी खो रहा|
उठ तो फिर से हे!पथिक मन
बढ़ते जा फिर चल-चला-चल|
गिला करके क्या मिला
फिर हश्र चाहे जो रहा|
स्वाति वल्लभा राज